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Self Care for Mothers: मां बनने के बाद खुद को तो नहीं भूल गईं? जानिए सेल्फ-केयर के तरीके

On: October 10, 2026 5:53 PM
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मां बनते ही ज़िंदगी पूरी तरह बदल जाती है। बच्चे की नींद, उसका खाना, स्कूल, बीमारी — सब कुछ याद रहता है, बस एक ही चीज़ भूल जाती है — खुद। अपना खाना समय पर खाना, थोड़ा आराम करना, अपनी पसंद की कोई चीज़ करना — ये सब ‘बाद में’ की लिस्ट में धकेल दिया जाता है। लेकिन सच ये है कि self care for mothers कोई शौक या लग्ज़री नहीं, बल्कि एक ज़रूरत है। जो मां खुद स्वस्थ और खुश रहेगी, वही बच्चे को भी बेहतर परवरिश दे पाएगी।

असल में सेल्फ-केयर का मतलब घंटों का स्पा या बड़ी छुट्टी नहीं है। इसका मतलब है — रोज़ थोड़ा-सा वक्त अपने नाम करना, ज़रूरत पड़ने पर मदद मांगना और खुद को इंसान समझना, सिर्फ मां नहीं। यहां जानिए कुछ ऐसे आसान तरीके, जो व्यस्त से व्यस्त मां की दिनचर्या में भी फिट हो जाएंगे।

मी-टाइम कोई गुनाह नहीं — रोज़ 20 मिनट अपने नाम करें

कई मांओं को अपने लिए वक्त निकालने में अपराधबोध होता है — लगता है जैसे बच्चे से वक्त चुरा रही हैं। दरअसल, ये सोच ही गलत है। रोज़ के सिर्फ 20-30 मिनट, जब आप सिर्फ अपने लिए कुछ करें — पसंदीदा गाना सुनें, बालकनी में बैठकर चाय का कप पिएं, या बस आंखें बंद करके बैठें — ये वक्त आपको तरोताज़ा कर देता है।

इस वक्त को भी उतनी ही गंभीरता से लें, जितनी बच्चे के ट्यूशन या डॉक्टर की अपॉइंटमेंट को लेते हैं। परिवार को बता दें कि ये आधा घंटा आपका है — धीरे-धीरे सबको इसकी आदत हो जाएगी और आपको भी।

मदद मांगना सीखें — self care for mothers का पहला कदम

मांओं की सबसे बड़ी दिक्कत है ‘सब कुछ खुद ही करना है’ वाली सोच। लेकिन सच ये है कि अकेले सब संभालने की कोशिश में सेहत और मन दोनों टूटते हैं। पति, सास-ससुर, भाई-बहन या भरोसेमंद दोस्त — जिससे भी मदद मिल सके, मांगने में झिझक कैसी?

बच्चे को एक-दो घंटे किसी भरोसेमंद के पास छोड़कर बाज़ार जाना, दोस्त से मिलना या बस सो जाना — इसमें कोई बुराई नहीं। मदद मांगना कमज़ोरी नहीं, बल्कि समझदारी है। जो मां आराम करेगी, वही बच्चे के साथ क्वालिटी टाइम भी बिता पाएगी।

छोटी-छोटी खुशियां — रोज़ की छोटी रस्में बनाएं

सेल्फ-केयर के लिए बड़े प्लान की ज़रूरत नहीं; छोटी-छोटी रोज़मर्रा की रस्में ही काफी हैं। सुबह उठकर दो मिनट गहरी सांस लेना, शाम को बच्चों के सोने के बाद अपनी पसंद का कोई शो देखना, हफ्ते में एक बार किसी दोस्त को फोन करना — ये छोटी चीज़ें मन को हल्का रखती हैं।

और हां, अपनी नींद से समझौता न करें। बच्चा जब सोए, तो फोन स्क्रॉल करने की जगह आप भी थोड़ा आराम कर लें। थकी हुई मां चिड़चिड़ी होती है, और आराम की हुई मां धैर्यवान — फर्क सिर्फ थोड़े-से आराम का है।

आखिर में याद रखें — आप सिर्फ एक मां नहीं, एक इंसान भी हैं, जिसकी अपनी ज़रूरतें, सपने और थकान हैं। खुद का ख्याल रखना स्वार्थ नहीं, बल्कि आपके और आपके बच्चे — दोनों के लिए सबसे बड़ा उपहार है। तो आज से ही शुरुआत करें — छोटी-सी, मगर अपनी।

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