अमेरिका ने कुशल विदेशी कामगारों के खिलाफ अपनी अब तक की सबसे बड़ी कार्रवाई (US visa crackdown) की है। ट्रंप प्रशासन ने माइक्रोसॉफ्ट, एडोब और इंफोसिस, TCS, विप्रो, HCL, कॉग्निजेंट, कैपजेमिनी समेत आठ बड़ी कंपनियों को ग्रीन कार्ड के अहम PERM प्रोग्राम से निलंबित कर दिया है। US PERM suspension की घोषणा गुरुवार को उपराष्ट्रपति जेडी वेंस और श्रम सचिव कीथ सोंडरलिंग ने की, और इसके साथ ही हार्वर्ड, येल और स्टैनफोर्ड समेत नौ शीर्ष विश्वविद्यालयों की जांच भी शुरू कर दी गई है।
PERM (परमानेंट लेबर सर्टिफिकेशन) वह प्रक्रिया है, जिससे ज्यादातर रोजगार-आधारित ग्रीन कार्ड के लिए गुजरना पड़ता है। इसके तहत नियोक्ताओं को यह साबित करना होता है कि किसी पद के लिए कोई योग्य अमेरिकी कामगार उपलब्ध नहीं है। श्रम विभाग अब इन कंपनियों से जुड़े नए PERM आवेदन स्वीकार नहीं करेगा और लंबित आवेदनों पर भी कार्रवाई नहीं करेगा। हालांकि, प्रशासन ने साफ किया है कि इससे कर्मचारियों के मौजूदा H-1B वीजा अपने आप रद्द नहीं होंगे।
US visa crackdown: माइक्रोसॉफ्ट पर सबसे तीखा निशाना
दरअसल, उपराष्ट्रपति वेंस ने माइक्रोसॉफ्ट को सबसे ज्यादा निशाने पर लिया। उन्होंने कहा, “दुर्भाग्य से अमेरिका में कोई भी कंपनी ऐसी नहीं है, जिसने इस सिस्टम का माइक्रोसॉफ्ट से ज्यादा दुरुपयोग किया हो।” वेंस के मुताबिक, कंपनी ने पिछले साल 6,000 अमेरिकी कामगारों की छंटनी की, जबकि उसे 6,300 H-1B वीजा और लगभग 3,000 ग्रीन कार्ड मिले। “आप अमेरिकी कामगारों को निकालकर उनकी जगह विदेशी बंधुआ मजदूर नहीं ला सकते,” वेंस ने कहा।
माइक्रोसॉफ्ट ने इस आरोप को चुनौती दी है। कंपनी का कहना है कि उसके ज्यादातर अमेरिकी कर्मचारी अमेरिकी नागरिक हैं, और पिछले वित्त वर्ष में उसके ज्यादातर H-1B आवेदन मौजूदा कर्मचारियों के दर्जे के विस्तार या बदलाव के लिए थे, न कि नई भर्तियों के लिए। गौरतलब है कि यह घोषणा उसी दिन हुई, जब ट्रंप माइक्रोसॉफ्ट के CEO सत्या नडेला को व्हाइट हाउस में नेशनल मेडल ऑफ टेक्नोलॉजी से सम्मानित करने वाले थे — नडेला खुद कभी H-1B वीजा धारक रहे हैं।
भारतीय पेशेवरों पर असर और विश्वविद्यालयों की जांच
असल में इस फैसले का सबसे ज्यादा असर भारतीय टेक पेशेवरों पर पड़ने की आशंका है। जिनके PERM प्रमाणन अभी लंबित हैं, उनके स्थायी निवास प्रायोजन में देरी होगी। श्रम विभाग का दावा है कि 2009 से इन कंपनियों ने लगभग 30 लाख विदेशी कामगारों के लिए अनुरोध किया, 2.3 लाख से ज्यादा H-1B मंजूरियां और 1 लाख से ज्यादा स्थायी श्रम प्रमाणन हासिल किए। विभाग ने 22 अरब डॉलर के वीजा धोखाधड़ी का भी खुलासा करने का दावा किया है।
टेक सेक्टर में इस साल अब तक 1.31 लाख से ज्यादा छंटनियां हो चुकी हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि PERM पर रोक से कंपनियों की भर्ती लागत बढ़ेगी और भारतीय पेशेवरों को ग्रीन कार्ड के लिए लंबा इंतजार करना पड़ सकता है।
साथ ही, नौ विश्वविद्यालयों — जिनमें MIT, हार्वर्ड, येल, स्टैनफोर्ड और कैल स्टेट शामिल हैं — में J-1 वीजा धोखाधड़ी की जांच शुरू की गई है। आरोप है कि इन संस्थानों ने अमेरिकी वेतन को कम करने के लिए अंतरराष्ट्रीय छात्रों को लाया। बहरहाल, कंपनियों और विश्वविद्यालयों ने अभी तक इन आरोपों पर विस्तृत जवाब नहीं दिया है, और यह भी स्पष्ट नहीं है कि ये प्रतिबंध कितने समय तक रहेंगे।















