हर साल टैक्स भरने का समय आता है और एक ही सवाल सबको परेशान करता है — न्यू टैक्स रिजीम चुनें या ओल्ड? एक तरफ कम दरों का लालच है, दूसरी तरफ छूट और कटौतियों का फायदा। गलत चुनाव का मतलब है हर साल हजारों रुपये ज्यादा टैक्स देना। इसलिए फैसला लेने से पहले दोनों रिजीम का फर्क समझना बहुत जरूरी है।
दरअसल दोनों रिजीम का बुनियादी फर्क सीधा है। न्यू रिजीम में टैक्स की दरें कम हैं, लेकिन ज्यादातर कटौतियों का फायदा नहीं मिलता। ओल्ड रिजीम में दरें थोड़ी ज्यादा हैं, लेकिन 80C, एचआरए, होम लोन के ब्याज जैसी कटौतियों से टैक्सेबल इनकम काफी घटाई जा सकती है। कौन सा बेहतर है, ये आपकी आय और निवेश की आदतों पर निर्भर करता है।
न्यू टैक्स रिजीम किनके लिए फायदेमंद
अगर आप ज्यादा निवेश या कटौतियों का फायदा नहीं लेते, तो न्यू रिजीम आपके लिए आसान और फायदेमंद हो सकता है। इसमें कम कागजी काम है, कम दरें हैं और स्टैंडर्ड डिडक्शन का फायदा भी मिलता है। खासकर उन नौकरीपेशा लोगों के लिए ये ठीक है जिनके पास न तो होम लोन है, न एचआरए का बड़ा दावा और न ही 80C में ज्यादा निवेश।
न्यू रिजीम की सबसे बड़ी खूबी इसकी सादगी है। टैक्स कैलकुलेशन सीधा होता है और साल के अंत में कागजात जुटाने की भागदौड़ नहीं होती। जो लोग निवेश के झंझट से बचना चाहते हैं, उन्हें ये रिजीम अक्सर ज्यादा टैक्स बचाकर देता है।
ओल्ड टैक्स रिजीम किनके लिए बेहतर
वहीं अगर आप पीपीएफ, ईएलएसएस, एनपीएस जैसी योजनाओं में नियमित निवेश करते हैं, होम लोन चुका रहे हैं या एचआरए का फायदा लेते हैं, तो ओल्ड रिजीम आपके लिए ज्यादा बचत वाला साबित हो सकता है। कटौतियों के बाद टैक्सेबल इनकम इतनी घट जाती है कि ऊंची दरों के बावजूद कुल टैक्स कम निकलता है।
बताया जा रहा है कि होम लोन वाले परिवारों के लिए तो ओल्ड रिजीम लगभग हमेशा फायदेमंद रहता है, क्योंकि मूलधन और ब्याज दोनों पर मिलने वाली छूट काफी बड़ी होती है। इसी तरह बच्चों की ट्यूशन फीस और बीमा प्रीमियम जैसी कटौतियां भी ओल्ड रिजीम में ही मिलती हैं।
फैसला लेने से पहले करें ये हिसाब
सबसे अच्छा तरीका है दोनों रिजीम में अपना टैक्स कैलकुलेट करके देखना। अपनी कुल आय लिखिए, फिर न्यू रिजीम में सिर्फ स्टैंडर्ड डिडक्शन घटाकर टैक्स निकालिए। इसके बाद ओल्ड रिजीम में अपनी सारी कटौतियां — 80C, एचआरए, होम लोन ब्याज, मेडिकल बीमा — घटाकर टैक्स निकालिए। जो कम हो, वही आपका जवाब है।
एक और जरूरी बात — जिस रिजीम को चुनें, उसके हिसाब से दस्तावेज भी तैयार रखें। ओल्ड रिजीम चुन रहे हैं तो निवेश की रसीदें, किराए की रसीदें और बीमा प्रीमियम के प्रमाण संभालकर रखें। न्यू रिजीम में कागजी काम कम है, लेकिन फॉर्म-16 और सैलरी स्लिप फिर भी जरूरी हैं। समय पर दस्तावेज जुटाने से आखिरी समय की भागदौड़ और गलतियां दोनों से बचा जा सकता है।
एक बात और जान लीजिए — नौकरीपेशा लोग हर साल रिजीम बदल सकते हैं, इसलिए ये फैसला स्थायी नहीं है। आपकी आय या निवेश की स्थिति बदले तो अगली बार दोबारा हिसाब लगाइए। और अगर मामला उलझा लगे तो किसी टैक्स सलाहकार से राय लेने में संकोच न करें। सही रिजीम चुनना कोई रॉकेट साइंस नहीं, बस थोड़े हिसाब-किताब की बात है।















