नई दिल्ली: इस्पात मंत्रालय ने सार्वजनिक क्षेत्र की दो दिग्गज कंपनियों — स्टील अथॉरिटी ऑफ इंडिया (SAIL) और नेशनल मिनरल डेवलपमेंट कॉरपोरेशन (NMDC) — को विदेशों में खनिज संपत्तियों की तलाश करने का निर्देश दिया है। इस पहल का प्रमुख लक्ष्य भविष्य के लिए कच्चे माल की निर्बाध आपूर्ति सुनिश्चित करना और उत्पादन लागत पर अंकुश लगाना है। मंत्रालय का मानना है कि इस कदम से आने वाले वर्षों में कच्चे माल की आवश्यकताएं पूरी करने में सहायता मिलेगी और लागत घटाने में भी मदद मिलेगी, हालांकि इस बारे में विस्तृत ब्योरा अभी सार्वजनिक नहीं किया गया है।
कोकिंग कोयले पर भारी आयात निर्भरता
इस्पात निर्माण के लिए लौह अयस्क और कोकिंग कोयला दो सबसे अहम कच्चे माल हैं। इनके अलावा चूना पत्थर और पल्वराइज्ड कोल इंजेक्शन भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। भारत में लौह अयस्क पर्याप्त मात्रा में मिलता है, लेकिन SAIL समेत भारतीय इस्पात कंपनियां अपनी कोकिंग कोयले की आवश्यकता का लगभग 85 से 90 प्रतिशत हिस्सा आयात करती हैं। यह कोयला मुख्यतः ऑस्ट्रेलिया और मोजाम्बिक जैसे देशों से मंगाया जाता है, जिसका सीधा असर उत्पादन लागत पर पड़ता है। इसी प्रकार चूना पत्थर का एक हिस्सा भी पश्चिम एशिया से आयात किया जाता है।
निजी क्षेत्र पहले से सक्रिय
निजी क्षेत्र की प्रमुख इस्पात कंपनी जेएसडब्ल्यू स्टील पहले ही विदेशों में कोकिंग कोयले की संपत्तियां हासिल कर चुकी है। कंपनी का लक्ष्य अपनी कच्चे माल की जरूरत का करीब 50 प्रतिशत हिस्सा अपने स्वयं के स्रोतों से पूरा करना है। ऐसे में सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनियों का विदेशों की ओर बढ़ना एक स्वाभाविक रणनीतिक कदम माना जा रहा है।
वहीं, मुख्यतः लौह अयस्क उत्पादन में सक्रिय NMDC अब अन्य खनिजों की खोज और उत्पादन के क्षेत्र में भी विस्तार की इच्छुक है। इसका उद्देश्य इस्पात सहित विभिन्न उद्योगों की बढ़ती खनिज मांग को पूरा करना है। NMDC के चेयरमैन अमिताव मुखर्जी ने हाल ही में कहा था कि वर्ष 2030 तक कंपनी के कुल राजस्व में लौह अयस्क के अतिरिक्त अन्य खनिजों की हिस्सेदारी कम से कम 20 प्रतिशत तक पहुंचाना उनका लक्ष्य है।
आत्मनिर्भरता की दिशा में अहम कदम
विशेषज्ञों के अनुसार विदेशों में खनन संपत्तियों का अधिग्रहण भारतीय इस्पात उद्योग हेतु लंबे समय से सुझाई जा रही रणनीति है। इससे न केवल कच्चे माल की कीमतों के उतार-चढ़ाव से सुरक्षा मिलेगी, बल्कि वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला में भारतीय कंपनियों की पकड़ भी मजबूत होगी। कोकिंग कोयले पर अत्यधिक आयात निर्भरता को देखते हुए यह पहल आत्मनिर्भरता की दिशा में महत्वपूर्ण मानी जा रही है। आने वाले समय में यह देखना रोचक होगा कि SAIL और NMDC इस दिशा में कितनी तेजी से ठोस समझौते करती हैं।









