वाशिंगटन से एक बेहद बड़ी और हैरान करने वाली खबर सामने आई है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने औपचारिक रूप से घोषणा कर दी है कि अमेरिकी सेना की अंतिम टुकड़ी इराक से पूरी तरह बाहर निकल रही है। इसके साथ ही दो दशक से भी अधिक समय से जारी अमेरिकी सैन्य हस्तक्षेप अब सदा के लिए समाप्त हो गया है और अमेरिका अपना समस्त साजो-सामान समेटकर स्वदेश लौट रहा है।
ट्रंप ने बुधवार को स्थानीय समयानुसार व्हाइट हाउस में ‘नेशनल हिस्पैनिक हेरिटेज मंथ’ के अवसर पर आयोजित कार्यक्रम में मंच से यह ऐतिहासिक घोषणा की। उन्होंने कहा, “आज मुझे यह ऐलान करते हुए अत्यंत प्रसन्नता हो रही है कि अमेरिकी सेना की आखिरी टुकड़ी इराक की धरती से पूर्णतः निकल रही है।” ट्रंप ने आगे कहा कि अतीत में कई गलत निर्णय लिए गए थे, जिनके कारण अमेरिका इस लंबी और कठिन परिस्थिति में फंस गया था। उन्होंने सेना की इस वापसी को अमेरिका और इराक दोनों के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण मोड़ बताया।
इतिहास का लंबा अध्याय समाप्त
राष्ट्रपति ट्रंप ने अपने संबोधन में कहा कि यह एक बेहद मुश्किल दौर था जो कई वर्षों तक लगातार चला, लेकिन अब जल्द ही इतिहास का वह भयावह अध्याय हमेशा के लिए बंद होने जा रहा है। अमेरिका के लिए यह एक शानदार दिन है। उन्होंने यह भी बताया कि अमेरिका इराक में एक नई और स्थिर सरकार छोड़कर जा रहा है।
उन्होंने इराक के प्रधानमंत्री अली अल-ज़ैदी की खूब तारीफ की और कहा कि देश में हुए चुनावों के दौरान उन्होंने उनका पूर्ण समर्थन किया था। ट्रंप ने अमेरिकी सैन्य भागीदारी की शुरुआत को राष्ट्रपति जॉर्ज डब्ल्यू. बुश के कार्यकाल में वर्ष 2003 में हुए हमले से जोड़ा। साथ ही उन्होंने वर्ष 2014 में इस्लामिक स्टेट (ISIS) समूह के विरुद्ध अमेरिका के नेतृत्व में शुरू ‘ऑपरेशन इनहेरेंट रिज़ॉल्व’ का विशेष उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि यह अभियान अब उनके अर्थात राष्ट्रपति डोनाल्ड जे. ट्रंप के नेतृत्व में वर्ष 2026 में पूर्णतः समाप्त हो रहा है।
ISIS की पराजय और इराक से पूर्ण वापसी
ट्रंप ने इस वापसी को अमेरिका और इराक दोनों की बड़ी विजय बताया और इसे इस्लामिक स्टेट के क्षेत्रीय ‘खिलाफत’ के समूल नाश से जोड़ा। उन्होंने कहा कि यह दिन अमेरिका के लिए विजय का दिन है, इराक के लिए विजय का दिन है और ISIS पर निर्णायक जीत का प्रतीक है, जिसे पूरी तरह कुचल दिया गया है — और वास्तव में यही मुख्य कारण था, जिसके लिए हम वहां गए थे।
ट्रंप ने स्पष्ट किया कि एरबिल एयर बेस से होने वाली इस वापसी में अमेरिकी सैनिक और उनके द्वारा प्रयुक्त समस्त सैन्य उपकरण दोनों शामिल हैं। उन्होंने इस वापसी की तुलना वर्ष 2021 में अफगानिस्तान से हुई अमेरिकी सेना की अव्यवस्थित वापसी से बार-बार की। उन्होंने कहा कि एरबिल एयर बेस से गठबंधन सेना और साजो-सामान की यह अत्यंत व्यवस्थित वापसी, नरक जैसी परिस्थितियों में चलाए गए एक बेहद महंगे अभियान के अंत का स्पष्ट प्रतीक है। उन्होंने गर्व से यह भी कहा कि हमने अपना एक-एक सामान वापस ले लिया है।
एक भी पेंच पीछे नहीं छोड़ा
डोनाल्ड ट्रंप ने बताया कि उन्होंने अपने सभी सैन्य कमांडरों को कड़े निर्देश दिए थे कि यह सुनिश्चित किया जाए कि कोई भी छोटी वस्तु वहां पीछे न छूटे। उन्होंने हल्के-फुल्के और सख्त अंदाज में कहा, “मैंने अपने कमांडरों से कहा था कि मुझे हर एक पेंच चाहिए। यदि जमीन पर कोई छोटा पेंच भी पड़ा मिले तो उसे भी उठा लो। यदि हमारे पास कैनवस का कोई पुराना टेंट भी है तो उसे भी साथ ले लो। हमने वहां से हर छोटी-बड़ी चीज उठा ली है।”
ट्रंप ने कहा कि उन्होंने हमेशा एक स्पष्ट मिशन तय किया, अपने कमांडरों को उसे पूरा करने हेतु आवश्यक समस्त संसाधन उपलब्ध कराए और वहां अपनी अस्थायी मौजूदगी को कभी स्थायी नहीं बनने दिया। उन्होंने बताया कि उन पर निरंतर यह दबाव डाला जा रहा था कि अमेरिका इराक में सदा बना रहे, लेकिन उन्होंने ऐसा करने से स्पष्ट इनकार कर दिया। उन्होंने कहा कि बहुत से लोग चाहते थे कि हम वहां हमेशा रहें, लेकिन मेरे पास रुकने या जाने का विकल्प था और मुझे पूर्ण विश्वास हो गया था कि अब अमेरिका के अपने घर लौटने का बिल्कुल सही समय आ चुका है।
23 वर्ष के संघर्ष का अंत और भारी कीमत
ट्रंप ने याद दिलाया कि अमेरिका पिछले 23 वर्षों से इस रक्तरंजित संघर्ष में शामिल रहा है और इस दौरान सैन्य उपस्थिति के कारण देश को बहुत बड़ा मानवीय नुकसान उठाना पड़ा है। उन्होंने कहा कि हमने इन 23 वर्षों के युद्ध में 4,500 से अधिक अपने श्रेष्ठ अमेरिकी सैनिकों को खोया है, जबकि 31,000 से ज्यादा सैनिक गंभीर रूप से घायल हुए हैं — जिनमें से कुछ की हालत अत्यंत खराब हुई है। इसके अतिरिक्त सैकड़ों आम नागरिक और ठेकेदार भी इस जंग में मारे गए।
स्मरण रहे कि अमेरिका के नेतृत्व में इराक पर यह सैन्य हमला मार्च 2003 में आरंभ हुआ था, जिसके बाद सद्दाम हुसैन की सरकार गिरा दी गई थी। हालांकि अधिकांश अमेरिकी सैनिकों को वर्ष 2011 में ही वापस बुला लिया गया था, लेकिन वर्ष 2014 में जब इस उग्रवादी आतंकी समूह ने इराक और सीरिया के बड़े भूभागों पर कब्जा कर लिया, तो एक अंतरराष्ट्रीय गठबंधन के अंग के रूप में अमेरिकी सेनाएं वहां दोबारा लौट आई थीं।









