यूरोप के सबसे बड़े दुष्प्रचार-विरोधी सम्मेलन में इस बार राजनीति हावी हो गई। लिथुआनिया की राजधानी विल्नियस में बुधवार को शुरू हुए Disinfo 2026 सम्मेलन के ठीक पहले यूरोपीय संघ की विदेश सेवा (EEAS), कनाडा और लिथुआनिया ने अपना स्पॉन्सरशिप वापस ले लिया। आरोप है कि यह सब ट्रंप प्रशासन के दबाव में हुआ, जिसने कई देशों से इस सम्मेलन का समर्थन वापस लेने को कहा था।
यह सम्मेलन ब्रुसेल्स के गैर-लाभकारी संगठन EU डिसइन्फोलैब द्वारा आयोजित यूरोप के काउंटर-डिसइन्फॉर्मेशन समुदाय का वार्षिक जमावड़ा है, जिसमें सैकड़ों शोधकर्ता, पत्रकार, तकनीकी विशेषज्ञ और नीति निर्माता जुटते हैं। सम्मेलन से कुछ दिन पहले ही लिथुआनिया के विदेश मंत्रालय, EEAS और ग्लोबल अफेयर्स कनाडा के लोगो सम्मेलन की वेबसाइट से हटा दिए गए। द गार्जियन के साथ साझा की गई तस्वीरों में दिखा कि आधिकारिक सामग्री पर इन संगठनों के लोगो पर सफेद स्टिकर चिपका दिए गए थे — जैसे जल्दबाजी में उन्हें हटाया गया हो।
अमेरिका को “खतरा” बताने वाले पैनल पर विवाद
दरअसल, विवाद की जड़ सम्मेलन के कार्यक्रम में थी। कुछ पैनलों में अमेरिका को “विदेशी सूचना हेरफेर और हस्तक्षेप” (FIMI) का कारक बताया गया था — यह यूरोपीय संघ का एक शब्द है, जो आमतौर पर रूस जैसे विदेशी कारकों द्वारा ऑनलाइन दुष्प्रचार फैलाने के लिए इस्तेमाल होता है। ट्रंप प्रशासन को यह बात नागवार गुजरी। द गार्जियन के देखे गए अमेरिकी विदेश विभाग के आंतरिक दस्तावेजों के मुताबिक, अमेरिकी अधिकारियों ने लिथुआनिया को “अमेरिकी चिंताओं को गंभीरता से लेने” के लिए धन्यवाद दिया।
तीन जानकार सूत्रों — जिनमें यूरोपीय अधिकारी भी शामिल हैं — ने पुष्टि की कि अमेरिकी विदेश विभाग ने कई सरकारों से सम्मेलन के समर्थन को लेकर संपर्क किया था। बताया जा रहा है कि यह संदेश अंडर सेक्रेटरी ऑफ स्टेट फॉर पब्लिक डिप्लोमेसी सारा बी. रोजर्स के कार्यालय से आया था। फ्रांस, नॉर्वे, रोमानिया और पोलैंड स्थित अमेरिकी दूतावासों को कहा गया कि वे मेजबान देशों को — मौखिक रूप से, लिखित में नहीं — बताएं कि अमेरिका इन पैनलों से नाखुश है।
Disinfo 2026 पर फ्रांस का अलग रुख
असल में सभी देश अमेरिकी दबाव के आगे नहीं झुके। फ्रांस के विदेश मंत्रालय ने अलग रुख अपनाया और फ्रांसीसी सरकार अब भी सम्मेलन की प्रायोजक बनी हुई है। वहीं, EEAS ने कहा कि उसने कार्यक्रम की सामग्री के कारण अपना लोगो हटाने को कहा था — हालांकि यह स्पष्ट नहीं है कि सरकारों ने वित्तीय समर्थन वापस लिया या सिर्फ सार्वजनिक रूप से दूरी बनाई। EEAS के प्रतिनिधि सम्मेलन में अपना शोध प्रस्तुत करते रहे।
सूत्रों के मुताबिक, जिन दूतावासों को यह संदेश दिया गया उनमें फ्रांस, नॉर्वे, रोमानिया और पोलैंड स्थित अमेरिकी दूतावास शामिल थे। उन्हें कहा गया था कि वे मेजबान देशों को मौखिक रूप से — लिखित में नहीं — बताएं कि अमेरिका इन पैनलों से नाखुश है।
गौरतलब है कि यह घटना ट्रंप प्रशासन के यूरोप पर चल रहे दबाव अभियान का हिस्सा मानी जा रही है, जिसमें दुष्प्रचार और ऑनलाइन अभिव्यक्ति को लेकर यूरोपीय रवैये की अमेरिकी आलोचना भी शामिल है। बहरहाल, आयोजकों का कहना है कि सम्मेलन अपने तय कार्यक्रम के अनुसार चल रहा है, लेकिन इस विवाद ने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर दुष्प्रचार से लड़ने के प्रयासों पर ही सवाल खड़े कर दिए हैं।















