3D प्रिंटिंग — यानी एडिटिव मैन्युफैक्चरिंग — को भारत अपने औद्योगिक भविष्य की सबसे बड़ी ताकतों में से एक मान रहा है। इसी दिशा में केंद्र सरकार अब NSAM 2.0 यानी नेशनल स्ट्रैटेजी फॉर एडिटिव मैन्युफैक्चरिंग के दूसरे चरण की परिकल्पना कर रही है, जिसका मकसद देश में 3D प्रिंटिंग के इकोसिस्टम को व्यावसायीकरण, बौद्धिक संपदा और रणनीतिक उपयोग की ओर ले जाना है।
इलेक्ट्रॉनिक्स और सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय (MeitY) के तहत 2022 में शुरू की गई पहली NSAM के बाद से भारत ने इस क्षेत्र में काफी प्रगति की है। प्रेस सूचना ब्यूरो (PIB) की 7 अक्टूबर 2026 की जानकारी के अनुसार, अब तक 1,54,000 से अधिक लोगों को एडिटिव मैन्युफैक्चरिंग से जुड़े कौशल का प्रशिक्षण दिया जा चुका है, 56 स्टार्टअप को सहयोग मिला है और राष्ट्रीय केंद्रों के नेटवर्क के जरिए 65 भारत-विशिष्ट प्रौद्योगिकियां विकसित हुई हैं।
दरअसल, NSAM की शुरुआत 2022 में इसलिए हुई थी ताकि भारत 3D प्रिंटिंग की वैश्विक दौड़ में पिछड़े नहीं। पहली रणनीति में वैश्विक एडिटिव मैन्युफैक्चरिंग बाजार में 5 प्रतिशत हिस्सेदारी, जीडीपी में करीब 1 अरब डॉलर का योगदान, 50 स्वदेशी प्रौद्योगिकियां, 100 स्टार्टअप, 500 उत्पाद और एक लाख कामगारों के कौशल जैसे लक्ष्य रखे गए थे। अब NSAM 2.0 उसी बुनियाद पर खड़ी एक और महत्वाकांक्षी छलांग मानी जा रही है।
NSAM 2.0 की प्राथमिकताएं क्या होंगी
नई रणनीति का फोकस क्षमता निर्माण से आगे बढ़कर व्यावसायीकरण, बौद्धिक संपदा (IPR) सृजन और रणनीतिक औद्योगिक उपयोग पर होगा। इसकी प्रमुख प्राथमिकताओं में स्वदेशी पेटेंट और IPR तैयार करना, एडिटिव मैन्युफैक्चरिंग इकोसिस्टम का डिजिटल एकीकरण, वैश्विक स्तर पर प्रतिस्पर्धी प्रौद्योगिकियों का व्यावसायीकरण, क्लस्टर-आधारित दृष्टिकोण से मशीनों और सामग्री की लागत कम करना, और एडिटिव इलेक्ट्रॉनिक्स की वैल्यू चेन को मजबूत करना शामिल है।
इसके अलावा, भारत के एडिटिव मैन्युफैक्चरिंग स्टार्टअप आधार का विस्तार, रक्षा क्षेत्र के लिए व्यापक सहयोग, सतत विकास लक्ष्यों (SDG) से जुड़े पायलट कार्यक्रम और मानकों, संयुक्त अनुसंधान व प्रौद्योगिकी साझेदारी के जरिए अंतरराष्ट्रीय सहयोग को भी बढ़ावा देने का प्रस्ताव है।
रक्षा, अंतरिक्ष और चिकित्सा में 3D प्रिंटिंग की धमक
एडिटिव मैन्युफैक्चरिंग की ताकत रक्षा और अंतरिक्ष जैसे क्षेत्रों में सबसे ज्यादा दिखती है। आईआईटी मद्रास से जुड़े स्टार्टअप अग्निकुल कॉसमॉस ने अपने अग्निबाण रॉकेट के लिए सिंगल-पीस 3D-प्रिंटेड सेमी-क्रायोजेनिक इंजन का इस्तेमाल किया है। वहीं, सेना ने अहमदाबाद में महज 12 हफ्तों में एडिटिव मैन्युफैक्चरिंग से दो मंजिला आवासीय इकाई बनाई है और लद्दाख में प्रीकास्ट रक्षा ढांचों तक इस तकनीक का विस्तार किया है।
चिकित्सा क्षेत्र में भी भारत 3D प्रिंटिंग से आयातित तकनीकों के स्वदेशी विकल्प तैयार कर रहा है। स्टार्टअप ओस्टियोफोर्ज प्राकृतिक रेशम-आधारित सामग्री से 3D-प्रिंटेड इम्प्लांट विकसित कर रहा है, जबकि टेक्नोलॉजी डेवलपमेंट बोर्ड स्वदेशी बायोसिरेमिक सामग्री से 3D-प्रिंटेड बोन ग्राफ्ट के विकास में सहयोग दे रहा है। ये ग्राफ्ट मरीज की शारीरिक बनावट के हिसाब से अनुकूलित किए जा सकते हैं, जिससे आयात पर निर्भरता घटने और स्वदेशी चिकित्सा उत्पादन के सशक्त होने की उम्मीद है।
विशाखापत्तनम स्थित आंध्र प्रदेश मेडटेक जोन (AMTZ) में भी एक ऑर्थोपेडिक इम्प्लांट सुविधा स्थापित की जा रही है, जिसमें मेटल 3D प्रिंटर का इस्तेमाल होगा। यह सुविधा सर्जरी के बाद ठीक होने के समय को कम करने और इम्प्लांट की लागत घटाने के उद्देश्य से बनाई जा रही है।
वैश्विक बाजार और भारत का अवसर
पीआईबी के अनुसार, वैश्विक एडिटिव मैन्युफैक्चरिंग मशीन बाजार के 2035 तक 149 अरब अमेरिकी डॉलर तक पहुंचने का अनुमान है, जबकि एडिटिव इलेक्ट्रॉनिक्स सप्लाई चेन के 18 अरब डॉलर से बढ़कर 112 अरब डॉलर होने का अनुमान है। यह वह बड़ा अवसर है, जिस पर NSAM 2.0 की नजर है।
असल में, 3D प्रिंटिंग की खासियत ही यही है — परत-दर-परत निर्माण से हल्के और जटिल उत्पाद बनते हैं, डिजाइन में तेजी से बदलाव संभव होता है और छोटे बैच में भी उत्पादन किफायती रहता है। एयरोस्पेस, चिकित्सा उपकरण, इलेक्ट्रॉनिक्स, ऊर्जा, खाद्य प्रसंस्करण और फोटोनिक्स जैसे क्षेत्रों में यह तकनीक पहले से ही अपनी जगह बना रही है।
बहरहाल, प्रशिक्षण और स्टार्टअप सहयोग से आगे अब असली चुनौती इन तकनीकों को निर्यात योग्य, वैश्विक स्तर पर प्रतिस्पर्धी उत्पादों में बदलने की है। NSAM 2.0 की परिकल्पना बताती है कि सरकार इस चुनौती को समझ रही है — और आत्मनिर्भर भारत से विकसित भारत के सफर में 3D प्रिंटिंग को एक केंद्रीय स्तंभ बनाने की तैयारी कर रही है।















