भूस्खलन जैसी प्राकृतिक आपदाओं से जूझ रहे दुनिया के तमाम देशों के लिए भारत से एक बड़ी खबर आई है। World Landslide Forum 2026 का आयोजन इस बार फरीदाबाद में होगा — और यह पहला मौका होगा जब यह प्रतिष्ठित अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन भारत की धरती पर आयोजित किया जाएगा। 23 से 27 नवंबर 2026 तक अमृता विश्व विद्यापीठम, फरीदाबाद के परिसर में दुनियाभर के वैज्ञानिक, इंजीनियर, नीति-निर्माता और छात्र एक साथ जुटेंगे।
यह फोरम हर तीन साल में एक बार इंटरनेशनल कंसोर्टियम ऑन लैंडस्लाइड्स (ICL) के तत्वावधान में यूनेस्को और संयुक्त राष्ट्र की अन्य एजेंसियों के सहयोग से आयोजित होता है। इसका पहला संस्करण 2008 में टोक्यो में हुआ था। अब सातवें संस्करण यानी WLF-7 की मेजबानी भारत को मिली है, जिसे भूस्खलन-संवेदनशील देश के लिए एक बड़ी उपलब्धि माना जा रहा है।
World Landslide Forum 2026 का विषय और एजेंडा
इस बार के फोरम का विषय है — “Landslide Science and Practice for Safe and Resilient Communities”, यानी सुरक्षित और लचीले समुदायों के लिए भूस्खलन विज्ञान और व्यवहार। सम्मेलन में भूस्खलन के विश्लेषण, निगरानी और पूर्व चेतावनी, मॉडलिंग, खतरे और जोखिम आकलन, न्यूनीकरण रणनीतियों, भूस्खलन के कारणों और जलवायु परिवर्तन के प्रभावों जैसे अहम विषयों पर चर्चा होगी।
फोरम कई बड़ी अंतरराष्ट्रीय और राष्ट्रीय प्रतिबद्धताओं से भी जुड़ा है — इनमें क्योटो लैंडस्लाइड कमिटमेंट 2020, आपदा जोखिम न्यूनीकरण के लिए सेंडाई फ्रेमवर्क 2015-2030, सतत विकास के 2030 एजेंडा और भारत सरकार का आपदा जोखिम न्यूनीकरण पर 10-सूत्रीय एजेंडा शामिल हैं। संचालन समिति में पृथ्वी विज्ञान मंत्रालय के सचिव डॉ. श्रीनिवास कुमार तुम्माला, इसरो के अध्यक्ष डॉ. वी. नारायणन, भारतीय भूवैज्ञानिक सर्वेक्षण के निदेशक डॉ. सैबल घोष और राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण के डॉ. कृष्णा वत्स जैसे वरिष्ठ अधिकारी शामिल हैं।
भारत के लिए यह आयोजन क्यों अहम है
दरअसल, भारत के हिमालयी राज्य — उत्तराखंड, हिमाचल प्रदेश, जम्मू-कश्मीर और पूर्वोत्तर के पहाड़ी इलाके — हर मानसून में भूस्खलन की चपेट में आते हैं। पहाड़ों का दरकना, सड़कें बंद होना, गांवों का कट जाना और तीर्थयात्राओं का प्रभावित होना हर साल की कहानी बन चुका है। ऐसी स्थिति में दुनिया के सबसे बड़े भूस्खलन विशेषज्ञों का भारत में जुटना हमारे लिए तकनीक, शोध और नीति — तीनों स्तरों पर लाभकारी हो सकता है।
विशेषज्ञों के अनुसार, पूर्व चेतावनी प्रणाली, सैटेलाइट आधारित निगरानी, वर्षा-सीमा मॉडलिंग और डिजिटल ट्विन जैसी नई तकनीकें भूस्खलन के खतरे को काफी हद तक कम कर सकती हैं। फोरम में इन्हीं तकनीकों पर कार्यशालाएं भी होंगी, जिनमें शोधकर्ता और युवा वैज्ञानिक सीधे अंतरराष्ट्रीय विशेषज्ञों से सीख सकेंगे।
दुनिया भर से भागीदारी और अपेक्षित नतीजे
फोरम में शोध संस्थानों, सरकारों, गैर-सरकारी संगठनों, उद्योग जगत और अंतरराष्ट्रीय एजेंसियों के प्रतिनिधियों के शामिल होने की उम्मीद है। आयोजकों का कहना है कि इसका उद्देश्य वैश्विक, क्षेत्रीय और स्थानीय स्तरों पर भूस्खलन जोखिम कम करने के लिए साझा प्राथमिकताओं की पहचान करना और समन्वित कार्रवाई की रूपरेखा तय करना है।
असल में, भूस्खलन विज्ञान को नीति और जमीनी अमल से जोड़ना ही इस फोरम की सबसे बड़ी ताकत है। भारत के लिए यह अवसर दोहरा है — एक तरफ देश की आपदा प्रबंधन क्षमताओं को दुनिया के सामने रखने का मौका, और दूसरी तरफ वैश्विक सर्वोत्तम प्रथाओं को अपने पहाड़ी राज्यों तक पहुंचाने का रास्ता। 27 नवंबर को फोरम के समापन पर जो घोषणाएं और कार्ययोजनाएं सामने आएंगी, उन पर पूरी दुनिया की नजर रहेगी।















