भारत की रक्षा ताकत अब दुनिया के बाज़ार में रिकॉर्ड तोड़ रही है। रक्षा मंत्रालय के आंकड़ों के अनुसार, वित्त वर्ष 2025-26 में देश का रक्षा निर्यात (defence exports India) 38,424 करोड़ रुपये के रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच गया है। यह पिछले वित्त वर्ष के 23,622 करोड़ रुपये से 62.66% ज़्यादा है — मतलब एक साल में 14,802 करोड़ रुपये की छलांग। नई दिल्ली में SIDM के 8वें वार्षिक सत्र में 9 अक्टूबर को रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने इन आंकड़ों को उजागर करते हुए कहा कि यह भारतीय स्वदेशी क्षमताओं पर बढ़ते वैश्विक भरोसे का प्रतीक है।
आंकड़ों में एक और अहम बात है — सरकारी और निजी दोनों क्षेत्रों ने इसमें हाथ बटाया है। रक्षा क्षेत्र की सरकारी कंपनियों (DPSU) ने 21,071 करोड़ रुपये (कुल का 54.84%) और निजी कंपनियों ने 17,353 करोड़ रुपये (45.16%) का निर्यात किया। राजनाथ सिंह ने सोशल मीडिया पोस्ट में कहा कि यह बड़ी छलांग भारत की स्वदेशी क्षमताओं और उन्नत निर्माण ताकत पर बढ़ते वैश्विक भरोसे को दर्शाती है, और देश एक “शानदार रक्षा निर्यात सफलता की कहानी” लिख रहा है।
Defence exports India: सिर्फ 12 साल में 56 गुना की छलांग
इस रिकॉर्ड का लंबा सफर और भी दिलचस्प है। वित्त वर्ष 2013-14 में भारत ने महज 686 करोड़ रुपये के रक्षा उपकरण निर्यात किए थे — 12 साल में यह आंकड़ा 56 गुना बढ़ गया है। सरकारी आंकड़ों के मुताबिक, भारतीय रक्षा उत्पाद अब 80 से ज़्यादा देशों तक पहुंच रहे हैं और निर्यातकों की संख्या 145 तक बढ़ गई है।
दरअसल, “आत्मनिर्भर भारत” कार्यक्रम के तहत स्वदेशी उत्पादन को बढ़ावा और आयात पर निर्भरता घटाने की जो मुहिम चली, उसी का नतीजा अब निर्यात के रूप में दिख रहा है। SIDM सत्र में रक्षा मंत्री ने घरेलू उद्योग से निजी क्षेत्र की भागीदारी को कुल उत्पादन के 24% से बढ़ाकर 50% तक करने का आह्वान भी किया, और 15 SIDM चैंपियन अवॉर्ड देकर स्वदेशी तकनीक, डिजाइन, आयात प्रतिस्थापन और निर्माण उत्कृष्टता को सम्मानित किया।
सस्ती मिसाइलें बढ़ा रहीं निर्यात की रफ्तार
इस तेज़ी के पीछे सबसे बड़ा हथियार है — कीमत का फायदा। रक्षा सचिव राजेश कुमार सिंह ने PAFI फोरम में बताया कि भारतीय मिसाइलें विदेशी निर्माताओं (OEM) की समान प्रणालियों की तुलना में करीब एक-चौथाई कीमत पर पेश की जा सकती हैं। खरीददार क्षमता और कीमत दोनों को तौलते हैं, और इस मामले में भारतीय प्रणालियां अब मुकाबले में आगे खड़ी हैं।
ब्रह्मोस मिसाइल भारत का सबसे जाना-माना निर्यात उत्पाद है, जिसके लिए दक्षिण-पूर्व एशिया के कई देशों में मांग है — या तो हम बेच रहे हैं या बातचीत चल रही है। इसके अलावा आर्टिलरी और माउंटेड गन सिस्टम तथा आकाश सतह-से-हवा मिसाइल प्रणाली का निर्यात भी लगातार बढ़ रहा है।
2028 तक 50,000 करोड़ रुपये का लक्ष्य
सरकार ने रक्षा निर्यात का औपचारिक लक्ष्य 2029 तक सालाना 50,000 करोड़ रुपये रखा है, लेकिन रक्षा सचिव का मानना है कि यह स्तर 2028 तक ही हासिल किया जा सकता है। मौजूदा स्तर से 50,000 करोड़ तक पहुंचने के लिए करीब 30% की और वृद्धि चाहिए — यानी सालाना औसतन 14% की दर। जिस रफ्तार से निर्यात बढ़ा है, उस हिसाब से यह अंकगणित तो साध्य लगता है।
असल सवाल यह है कि क्या भारत का रक्षा उद्योग इस रफ्तार को टिकाऊ बना सकता है — उत्पाद की गुणवत्ता, समय पर डिलीवरी, प्रतिस्पर्धी कीमत और अंतरराष्ट्रीय खरीदारों की शर्तों पर खरी उतरना ही असली चुनौती है। SIDM सत्र में इस पर भी ज़ोर रहा कि जटिल हथियार प्रणालियों के लिए स्वदेशी अनुसंधान, मज़बूत सप्लाई चेन और निर्माण क्षमता बढ़ाना राष्ट्रीय सुरक्षा का केंद्र है।
निर्यात का यह रिकॉर्ड सिर्फ आंकड़ा नहीं है — यह उस बदलाव की कहानी है जहां भारत रक्षा उपकरणों का आयातक भर नहीं रह गया, बल्कि दुनिया के खरीदारों के लिए एक भरोसेमंद विकल्प बनता जा रहा है।















