कच्चे तेल की कीमतों ने एक बार फिर चिंता बढ़ा दी है। गुरुवार को ब्रेंट क्रूड का भाव 2.28 प्रतिशत उछलकर 102.28 डॉलर प्रति बैरल पर पहुंच गया, जबकि अमेरिकी WTI क्रूड 1.88 प्रतिशत बढ़कर 89.94 डॉलर प्रति बैरल पर कारोबार करता दिखा। मध्य-पूर्व से आपूर्ति को लेकर बनी चिंता और अमेरिका की खाड़ी में बन रहे तूफान के खतरे ने बाज़ार में हलचल मचा दी है।
दरअसल, खाड़ी और होर्मुज़ जलडमरूमध्य में जहाज़ों पर हमले बढ़ गए हैं। ब्रिटेन की समुद्री व्यापार निगरानी एजेंसी (UKMTO) के मुताबिक, कतर के उत्तर में एक टैंकर पर कई प्रक्षेपास्त्रों से हमला हुआ, जिसमें लोग हताहत भी हुए। ऊर्जा विश्लेषक शौल कावोनिक का कहना है कि ईरानी हमलों की आवृत्ति युद्ध शुरू होने के बाद सबसे ऊंचे स्तर पर है और आगे और तेज़ हो सकती है।
होर्मुज़ से लेकर मैक्सिको की खाड़ी तक दोहरी मार
होर्मुज़ जलडमरूमध्य वैश्विक तेल और LNG आपूर्ति का करीब 20 प्रतिशत वहन करता है। अमेरिका-इज़रायल और ईरान के बीच संघर्ष अब आठवें महीने में है, और टैंकरों पर हमले पिछले हफ्ते युद्ध शुरू होने के बाद के सबसे ऊंचे स्तर पर पहुंच गए। उधर, मैक्सिको की खाड़ी में बन रहा तूफान अमेरिका के अपतटीय उत्पादन के लिए खतरा है — इस इलाके से अमेरिका के कच्चे तेल उत्पादन का करीब 15 प्रतिशत और प्राकृतिक गैस का 5 प्रतिशत आता है, और छह रिफाइनरियां भी खतरे में हैं।
सऊदी अरामको के CEO अमीन नासर ने लंदन में एक ऊर्जा सम्मेलन में चेतावनी दी कि वैश्विक तेल भंडार को दोबारा भरने में दो साल तक लग सकते हैं। उनके मुताबिक, फरवरी में ईरान पर हमलों के बाद से करीब 3 अरब बैरल आपूर्ति खत्म हुई, जबकि भंडार से सिर्फ 1 अरब बैरल जारी किया गया। भंडार में बचे करीब 6 अरब बैरल “व्यावहारिक रूप से उपलब्ध नहीं” हैं। उधर, G7 देशों ने शुक्रवार को आपात भंडार से 100 मिलियन बैरल डीज़ल और कच्चा तेल जारी करने पर सहमति जताई, जबकि अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी (IEA) ने तेल भंडार की रिलीज़ तेज़ करने का फैसला किया।
Crude Oil Price Today बढ़ने से भारत पर क्या असर
भारत कच्चे तेल का बड़ा आयातक है, इसलिए ब्रेंट के 100 डॉलर से ऊपर बने रहने का सीधा असर देश की अर्थव्यवस्था पर पड़ता है। महंगा कच्चा तेल पेट्रोल-डीज़ल की कीमतों पर दबाव बनाता है, जिससे महंगाई बढ़ने का खतरा रहता है। असल में, ईंधन महंगा होने से माल ढुलाई और रोज़मर्रा की चीज़ों की कीमतें भी बढ़ती हैं।
तेल बाज़ार पर दबाव के पीछे और भी कारण हैं। अक्टूबर की शुरुआत में ब्रेंट के 100 डॉलर के पार जाने के पीछे मध्य-पूर्व में तीसरे अमेरिकी विमानवाहक पोत की तैनाती और चीन द्वारा ईंधन निर्यात पर रोक जैसे झटके भी रहे। अमेरिकी पेट्रोलियम संस्थान (API) के आंकड़ों के मुताबिक, 2 अक्टूबर को समाप्त सप्ताह में अमेरिका के वाणिज्यिक कच्चे तेल भंडार में 20.9 लाख बैरल की गिरावट आई, जिससे आपूर्ति को लेकर चिंता और गहरी हुई।
बहरहाल, बाज़ार की नज़र अब दो चीज़ों पर है — होर्मुज़ जलडमरूमध्य में हालात कब सामान्य होते हैं और अमेरिका की खाड़ी का तूफान कितना नुकसान पहुंचाता है। जब तक ये जोखिम बने रहेंगे, कच्चे तेल की कीमतों में उतार-चढ़ाव जारी रहेगा और भारत जैसे आयातक देशों की चिंता भी।















