भारतीय नौसेना के बेड़े में एक और स्वदेशी युद्धपोत शामिल होने जा रहा है। Anti-Submarine Warfare Shallow Water Craft (ASW-SWC) श्रेणी का तीसरा जहाज Mangrol ship सोमवार, 12 अक्टूबर 2026 को मुंबई के नौसैनिक गोदी में औपचारिक रूप से कमीशन किया जाएगा। रक्षा मंत्रालय के प्रेस सूचना ब्यूरो ने 9 अक्टूबर को इस बारे में आधिकारिक घोषणा की थी।
इस जहाज का निर्माण केरल के कोच्चि स्थित कोचीन शिपयार्ड लिमिटेड (CSL) ने किया है। समारोह की अध्यक्षता पश्चिमी नौसेना कमान के फ्लैग ऑफिसर कमांडिंग-इन-चीफ वाइस एडमिरल संजय वात्स्यायन करेंगे, जिसमें वरिष्ठ नौसेना और रक्षा अधिकारी, रक्षा मंत्रालय और CSL के प्रतिनिधि, पूर्व नौसैनिक तथा स्वदेशी हथियार और सेंसर निर्माताओं के प्रतिनिधि मौजूद रहेंगे।
Mangrol ship की ताकत: पनडुब्बी रोधी हथियार और स्वदेशी सेंसर
मंगरोल को तटीय और उथले पानी में पनडुब्बियों से होने वाले खतरों का पता लगाने और उन्हें निष्प्रभावी करने के लिए डिजाइन किया गया है। जहाज पर अभय हल-माउंटेड सोनार, हल्के वजन के टॉरपीडो, स्वदेशी पनडुब्बी रोधी रॉकेट लॉन्चर और मारिच एडवांस्ड टॉरपीडो डिकोय सिस्टम जैसे आधुनिक हथियार और सेंसर लगे हैं। तीन डीजल इंजन और वॉटरजेट प्रोपल्शन की वजह से इसे संकरे पानी में बेहतरीन गतिशीलता मिलती है।
पनडुब्बी रोधी अभियानों के अलावा यह जहाज समुद्र के नीचे निगरानी, लो-इंटेंसिटी मैरीटाइम ऑपरेशन्स और माइन वारफेयर से जुड़े कार्यों में भी सक्षम है। दरअसल, बंदरगाहों, हारबरों और तटीय रास्तों की सुरक्षा के लिए ऐसे विशेष जहाज बेहद अहम होते हैं, क्योंकि बड़े युद्धपोत उथले पानी में आसानी से काम नहीं कर सकते।
80% से ज्यादा स्वदेशी: आत्मनिर्भर भारत की झलक
मंगरोल का निर्माण 80 प्रतिशत से अधिक स्वदेशी सामग्री से हुआ है, जो भारत की बढ़ती युद्धपोत डिजाइन और निर्माण क्षमता को दर्शाता है। यह मेक इन इंडिया और आत्मनिर्भर भारत अभियानों के तहत तैयार किया गया है, और रक्षा जहाज निर्माण में आत्मनिर्भरता की दिशा में एक अहम कदम माना जा रहा है।
नाम के पीछे की कहानी: गुजरात का मंगरोल शहर
कोचीन शिपयार्ड लिमिटेड देश का प्रमुख जहाज निर्माण और मरम्मत संगठन है, और ASW-SWC कार्यक्रम के तहत ऐसे जहाजों का निर्माण घरेलू शिपयार्डों की बढ़ती क्षमता को दर्शाता है। इन जहाजों की तैनाती से नौसेना की तटीय रक्षा, बंदरगाह सुरक्षा और समुद्री बुनियादी ढांचे की हिफाजत की क्षमता मजबूत होगी — खासकर उन इलाकों में जहां बड़े युद्धपोतों का संचालन सीमित रहता है।
इस युद्धपोत का नाम गुजरात के जूनागढ़ जिले के तटीय शहर मंगरोल के नाम पर रखा गया है, जो अपने मत्स्य बंदरगाह के लिए जाना जाता है। यह नामकरण पूर्ववर्ती INS Mangrol (M85) की विरासत को आगे बढ़ाता है — एक माइनस्वीपर जहाज, जिसने 7 अप्रैल 2004 तक भारतीय नौसेना में सेवा दी थी। नौसेना की परंपरा रही है कि पुराने युद्धपोतों के नाम नए जहाजों को देकर उनकी विरासत को जिंदा रखा जाता है।
भारत की लंबी तटरेखा और व्यस्त समुद्री व्यापार मार्गों को देखते हुए तटीय पनडुब्बी रोधी क्षमता को रणनीतिक रूप से अहम माना जाता है। उथले पानी में छिपी पनडुब्बियों का पता लगाना सबसे मुश्किल चुनौतियों में से एक है, और मंगरोल जैसे विशेष जहाज इसी खामी को भरते हैं। स्वदेशी सोनार और हथियार प्रणालियों से लैस यह जहाज भारतीय नौसेना के आत्मनिर्भर बेड़े की दिशा में एक और मजबूत कदम है।















