मतदाता सूची से नाम हटाने की प्रक्रिया में लगने वाली अटकलों पर चुनाव आयोग ने बड़ा फैसला लिया है। ECI Form 7 Limit के तहत आयोग ने शुक्रवार को एक व्यक्ति द्वारा दाखिल की जा सकने वाली फॉर्म 7 अर्जियों की अधिकतम संख्या तय कर दी है। आयोग का कहना है कि बिना ठोस आधार के बड़ी संख्या में आपत्तियां दाखिल की जा रही थीं, जिससे मतदाताओं को परेशानी और अधिकारियों पर अतिरिक्त बोझ पड़ रहा था।
नए निर्देशों के मुताबिक, दावे और आपत्तियों की अवधि के दौरान कोई भी व्यक्ति अधिकतम 10 फॉर्म 7 आवेदन दाखिल कर सकेगा। यह सीमा ऑनलाइन और ऑफलाइन दोनों माध्यमों पर लागू होगी। वहीं, जब चुनावी रोल का लगातार अद्यतन चल रहा हो, यानी विशेष पुनरीक्षण का दौर न हो, तब यह सीमा हर महीने अधिकतम 5 आवेदन की होगी। आयोग ने सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों के मुख्य निर्वाचन अधिकारियों को इस बारे में फील्ड स्टाफ को जानकारी देने के निर्देश दिए हैं।
ECI Form 7 Limit के पीछे क्या है और फॉर्म 7 का विवाद क्यों उठा
दरअसल, फॉर्म 7 वह वैधानिक आवेदन है जिसका इस्तेमाल मतदाता सूची में किसी नाम के शामिल किए जाने पर आपत्ति दर्ज करने या पहले से मौजूद किसी नाम को हटाने की मांग के लिए होता है। निर्वाचक पंजीकरण नियम, 1960 के नियम 13(2) के तहत फॉर्म 7 केवल वही व्यक्ति दाखिल कर सकता है जिसका नाम उसी विधानसभा क्षेत्र की मतदाता सूची में दर्ज हो।
समस्या तब शुरू हुई जब कर्नाटक और ओडिशा से ऐसी रिपोर्टें आईं कि कुछ लोग बड़ी संख्या में फॉर्म 7 दाखिल कर रहे हैं। आयोग के अनुसार, ऑनलाइन सिस्टम में पहले से ही एक बार में 6 आवेदनों की सीमा तय थी, लेकिन भौतिक रूप से जमा किए जाने वाले फॉर्मों की संख्या पर कोई स्पष्ट सीमा नहीं थी। यह मामला चुनाव पंजीकरण अधिकारियों के विवेक पर छोड़ दिया गया था।
कर्नाटक के बेल्लारी से लेकर ओडिशा तक बल्क फाइलिंग की रिपोर्ट
बताया जा रहा है कि कांग्रेस ने कर्नाटक के कई निर्वाचन क्षेत्रों में बल्क फाइलिंग का मुद्दा उठाया था। आरोप है कि बेल्लारी में एक अकेले बीजेपी कार्यकर्ता ने कथित तौर पर 7,561 फॉर्म 7 आवेदन दाखिल किए। कर्नाटक के मुख्यमंत्री डी.के. शिवकुमार ने यह भी आरोप लगाया कि बीजेपी कार्यकर्ताओं को पहले से छपे हुए फॉर्म 7 दिए गए थे ताकि नाम हटाने की मांग की जा सके, और इस मामले में एफआईआर भी दर्ज हुई है।
आयोग ने कहा है कि एकसमान सीमा के अभाव में फील्ड अधिकारियों को खास दिक्कत हो रही थी, क्योंकि बिना पर्याप्त जानकारी के बड़ी संख्या में आपत्तियां दाखिल की जा रही थीं। नई सीमा से इस अनिश्चितता को खत्म करने का इरादा है। आयोग ने अधिकारियों को यह भी निर्देश दिया है कि सभी आवेदनों की सख्ती से जांच हो, उचित सुनवाई की जाए और गलत घोषणा करने वालों के खिलाफ कार्रवाई की जाए।
मतदाताओं को राहत, आगे क्या होगा
आयोग का मानना है कि यह कदम न सिर्फ बेबुनियाद बल्क आपत्तियों को हतोत्साहित करेगा, बल्कि मतदाताओं को होने वाली असुविधा भी कम होगी और चुनाव अधिकारियों का कामकाज भी आसान होगा। निर्देश यह भी स्पष्ट करते हैं कि जिन मतदाताओं के नाम हटाने की मांग की गई है, उन्हें अपना पक्ष रखने का मौका दिया जाएगा और सुनवाई के बाद ही कोई नाम हटाया जाएगा।
असल में, मताधिकार की ईमानदारी बनाए रखना चुनाव आयोग की सबसे बड़ी जिम्मेदारियों में एक है। फॉर्म 7 का प्रावधान मृत, स्थानांतरित या फर्जी मतदाताओं के नाम हटाने के लिए है, न कि किसी सुनियोजित अभियान के तहत वास्तविक मतदाताओं को सूची से बाहर करने के लिए। नई सीमा इस संतुलन को बनाए रखने की दिशा में एक अहम कदम मानी जा रही है।















