उत्तराखंड के राजकीय इंटर कॉलेजों में वर्षों से खाली पड़ी प्रधानाचार्य की कुर्सियों पर आखिरकार स्थायी तैनाती का दौर शुरू हो गया है। विद्यालयी शिक्षा विभाग ने अध्यापन संवर्ग के 32 प्रधानाध्यापकों को पदोन्नति देकर राजकीय बालक एवं बालिका इंटर कॉलेजों में प्रधानाचार्य बना दिया है। विभागीय मंत्री डॉ. धन सिंह रावत के अनुमोदन के बाद शिक्षा सचिव ज्योति यादव ने इसके विधिवत आदेश जारी कर दिए। यह ‘principal promotion’ प्रदेश के स्कूलों में लंबे समय से चली आ रही प्रभारी व्यवस्था को खत्म करने की दिशा में बड़ा कदम माना जा रहा है।
दरअसल, नियमित प्रधानाचार्यों की भारी कमी के कारण अधिकांश विद्यालय लंबे समय से प्रभारी व्यवस्था के सहारे संचालित हो रहे थे। वरिष्ठ प्रवक्ताओं या उप-प्रधानाचार्यों को विद्यालय का कामकाज सौंपा गया था, जिससे वित्तीय और प्रशासनिक निर्णय अटके पड़े थे। पदोन्नति की प्रक्रिया विभिन्न संवर्ग विवादों और विभागीय प्रक्रियाओं के कारण सालों से लंबित चल रही थी। अब स्थायी मुखिया मिलने से स्कूलों में शैक्षणिक अनुशासन और प्रशासनिक गतिविधियों को नई गति मिलने की उम्मीद है।
देहरादून को 12 प्रधानाचार्य, पहाड़ के चमोली-टिहरी को सिर्फ एक-एक: ‘principal promotion’ में असंतुलन
हालांकि, इस पदोन्नति सूची में मैदानी और पर्वतीय जिलों के बीच बड़ा असंतुलन भी सामने आया है। कुल 32 पदोन्नत प्रधानाचार्यों में से एक दर्जन यानी 12 प्रधानाचार्यों को केवल देहरादून जनपद के विभिन्न इंटर कॉलेजों में भेजा गया है। हरिद्वार जनपद को 5 और नैनीताल को 4 प्रधानाचार्य मिले हैं, जबकि ऊधमसिंह नगर, पौड़ी और उत्तरकाशी जनपद में 3-3 प्रधानाचार्यों की तैनाती की गई है।
इसके उलट, विषम भौगोलिक परिस्थितियों वाले सीमांत पर्वतीय जिलों चमोली और टिहरी के हिस्से महज एक-एक पद आया है। शिक्षा महकमे में इस असमान वितरण को लेकर सुगबुगाहट शुरू हो गई है, क्योंकि पहाड़ के दूरस्थ इलाकों में शिक्षकों और प्रशासनिक प्रभारियों की कमी लंबे समय से सबसे बड़ा मुद्दा रही है। स्थानीय लोगों के अनुसार, जिन स्कूलों को सबसे ज्यादा स्थायी नेतृत्व की जरूरत है, वहीं सबसे कम तैनाती हुई है।
सालों से अटकी थी पदोन्नति, प्रभारी भरोसे चल रहे थे स्कूल
प्रदेश के राजकीय इंटर कॉलेजों में प्रधानाचार्य के पद लंबे समय से रिक्त पड़े थे। प्रभारी व्यवस्था में स्कूल का संचालन अस्थायी हाथों में होने से कई अहम फैसले लेने में देरी होती थी। बजट खर्च, शिक्षकों की उपस्थिति और पठन-पाठन की निगरानी जैसे काम प्रभावित हो रहे थे। विभागीय मंत्री डॉ. धन सिंह रावत ने इस फैसले पर मुहर लगाते हुए कहा कि 32 प्रधानाध्यापकों को पदोन्नत कर प्रधानाचार्य की जिम्मेदारी सौंपने से स्कूलों में शैक्षणिक अनुशासन और प्रशासनिक गतिविधियों को नई गति मिलेगी।
उन्होंने स्पष्ट किया कि स्थायी मुखिया मिलने से विद्यालयों में शिक्षण व्यवस्था चुस्त होगी और छात्र-छात्राओं के सर्वांगीण विकास में सीधे मदद मिलेगी। शिक्षा विभाग का मानना है कि बोर्ड परीक्षाओं की तैयारियों के बीच प्रधानाचार्यों की स्थायी मौजूदगी से कॉलेजों में शिक्षकों की उपस्थिति और पढ़ाई की निगरानी मजबूत होगी।
पंद्रह दिन में कार्यभार संभालने का कड़ा निर्देश
शिक्षा सचिव ज्योति यादव द्वारा जारी शासनादेश में स्पष्ट किया गया है कि सभी पदोन्नत प्रधानाचार्यों को अपने नवीन तैनाती स्थल पर एक पखवाड़े यानी 15 दिन के भीतर अनिवार्य रूप से पदभार ग्रहण करना होगा। किसी भी स्तर पर हीलाहवाली या तैनाती स्थल में फेरबदल के दबाव को रोकने के लिए शासन ने सख्त रुख अपनाया है।
आदेश के तहत सभी जनपदों के मुख्य शिक्षा अधिकारियों को निर्देशित किया गया है कि निर्धारित समयसीमा के भीतर कार्यभार ग्रहण कराने की अनुपालन रिपोर्ट तत्काल शासन को भेजी जाए। बताया जा रहा है कि शासन इस पूरी प्रक्रिया पर कड़ी नजर रखेगा, ताकि पदोन्नति का लाभ जल्द से जल्द स्कूलों तक पहुंचे और छात्रों की पढ़ाई में कोई बाधा न आए।









