उत्तराखंड में हजारों बच्चे ऐसी मानसिक और सीखने संबंधी दिक्कतों से जूझ रहे हैं जिनका इलाज और सरकारी मदद दोनों मौजूद है, लेकिन उनके माता-पिता को इसकी भनक तक नहीं है। Uttarakhand child mental health survey की ताजा रिपोर्ट ने राज्य के सामने एक ऐसी कड़वी हकीकत रखी है जिसे अब और नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।
दरअसल, नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ मेंटल हेल्थ एंड न्यूरो साइंसेज (NIMHANS) बेंगलुरु, उत्तराखंड राज्य मानसिक स्वास्थ्य प्राधिकरण और राजकीय दून मेडिकल कॉलेज के संयुक्त सर्वेक्षण में सामने आया है कि राज्य में 35 हजार 746 बच्चे और किशोर बौद्धिक दिव्यांगता, ऑटिज्म, एडीएचडी, अवसाद और सीखने की गंभीर कठिनाइयों से प्रभावित हैं। वित्तीय वर्ष 2024-25 में किए गए इस अध्ययन की सबसे चौंकाने वाली बात यह रही कि 99 फीसदी से ज्यादा पीड़ित परिवार अपने कानूनी अधिकारों और सरकारी सहायता तंत्र से पूरी तरह कटे हुए हैं।
Uttarakhand child mental health survey: यूडीआईडी कार्ड के नाम से बेखबर 99 फीसदी परिवार
असल में, सर्वेक्षण में अधिकारों और सरकारी दस्तावेजों को लेकर जो खुलासा हुआ, वह नीति निर्माताओं के लिए आंखें खोलने वाला है। जब 385 अभिभावकों से यूनिक डिसेबिलिटी आईडी (UDID) कार्ड के बारे में पूछा गया तो 99.74 फीसदी लोग इसके नाम तक से वाकिफ नहीं थे। महज 0.26 फीसदी अभिभावकों ने इसके बारे में सुना था, और यूडीआईडी से मिलने वाले फायदों की जानकारी किसी भी अभिभावक को नहीं थी।
बताया जा रहा है कि दिव्यांगता की जांच कहां होती है, यह जानने वाले सिर्फ 3.64 फीसदी थे, जबकि महज 1.04 फीसदी ने कभी अपने बच्चे का औपचारिक मेडिकल असेसमेंट कराया था। राज्य में प्रमाणित दिव्यांगता प्रमाणपत्र धारक बच्चों का अनुपात 1 फीसदी से भी कम, यानी 0.78 फीसदी दर्ज किया गया। दिव्यांगजन अधिकार अधिनियम 2016, मानसिक स्वास्थ्य देखभाल अधिनियम 2017 और राष्ट्रीय न्यास अधिनियम 1999 जैसी वैधानिक सुरक्षाओं से पहाड़ी और ग्रामीण क्षेत्रों के परिवार पूरी तरह बेखबर हैं।
चार जिलों के 80 क्लस्टरों में हुआ अध्ययन, ये हैं आंकड़े
यह अध्ययन देहरादून, पौड़ी गढ़वाल, अल्मोड़ा और नैनीताल के ग्रामीण व शहरी इलाकों के 80 क्लस्टरों में 0 से 17 वर्ष आयु वर्ग के 802 बच्चों और उनके अभिभावकों के विस्तृत इंटरव्यू पर आधारित है। वर्ष 2011 की जनगणना के आधार पर तैयार अनुमानों के मुताबिक, राज्य में बौद्धिक दिव्यांगता की दर प्रति 10 हजार पर 56 पाई गई, जिससे करीब 14,790 बच्चे प्रभावित हैं।
इसके बाद विशिष्ट अधिगम अक्षमता यानी स्पेसिफिक लर्निंग डिसेबिलिटी की दर प्रति 10 हजार पर 55 है, जिसकी जद में करीब 12,369 बच्चे हैं। दोनों श्रेणियों को मिला दिया जाए तो 27 हजार से अधिक बच्चे सीखने और दैनिक गतिविधियों में संघर्ष कर रहे हैं। इसके अतिरिक्त, चिंता और अवसाद के 5,067, ऑटिज्म स्पेक्ट्रम डिसऑर्डर के 2,445 और एडीएचडी के 1,075 संभावित मामले सामने आए हैं। गौरतलब है कि स्कूलों में बच्चों की सीखने की अक्षमता या व्यवहार में बदलाव को अकसर केवल ‘पढ़ाई में कमजोरी’ मानकर दबा दिया जाता है।
स्कूलों में विशेष शिक्षकों और काउंसलरों की सिफारिश
जमीनी स्वास्थ्य ढांचे की स्थिति यह है कि सामान्य शारीरिक बीमारियों में 66.21 फीसदी और न्यूरोलॉजिकल दिक्कतों में 65.83 फीसदी लोग सरकारी अस्पतालों का रुख करते हैं, लेकिन मानसिक स्वास्थ्य संबंधी सलाह के लिए डॉक्टर के पास जाने वालों की तादाद महज 2.36 फीसदी है। करीब 99.39 फीसदी माता-पिता ने युवा-केंद्रित स्वास्थ्य क्लीनिकों का नाम तक नहीं सुना।
विशेषज्ञों ने स्पष्ट सिफारिश की है कि बच्चों में मानसिक व न्यूरोलॉजिकल विकारों की समय पर स्क्रीनिंग को राष्ट्रीय बाल स्वास्थ्य कार्यक्रम (RBSK), स्कूलों और नियमित टीकाकरण से सीधे जोड़ा जाए। स्कूलों में विशेष शिक्षकों और काउंसलरों की नियमित तैनाती के बिना समावेशी शिक्षा संभव नहीं है। साथ ही, आशा और आंगनबाड़ी कार्यकर्ताओं के माध्यम से यूडीआईडी कार्ड और जिला मानसिक स्वास्थ्य कार्यक्रम की जानकारी घर-घर पहुंचाना अब अनिवार्य हो चुका है। बहरहाल, सर्वे ने साफ कर दिया है कि दिक्कत संसाधनों की कमी से ज्यादा जागरूकता की कमी है।









