देहरादून नगर निगम में अधिकारियों के आराम और सहूलियत पर खर्च हो रहे जनता के पैसों पर अब लगाम कस दी गई है। नगर आयुक्त आलोक कुमार पांडेय ने सख्त रुख अपनाते हुए निगम में अधिकारियों व कर्मचारियों के नाम पर दौड़ रही 31 अनुबंधित गाड़ियों में से 18 वाहनों को तुरंत हटाने का कड़ा आदेश जारी किया है। 58 फीसदी से ज्यादा गाड़ियों पर चली इस कैंची से नगर निगम को हर साल करीब 1.5 करोड़ रुपये की सीधी बचत होगी। यह पूरी कवायद ‘nagar nigam vehicles’ पर हो रहे फिजूलखर्च पर ब्रेक लगाने की दिशा में सबसे बड़ा कदम मानी जा रही है।
प्रशासन ने साफ कर दिया है कि अफसरों की गाड़ियों पर बचने वाला यह बजट अब शहर की चरमराती सफाई व्यवस्था, कूड़ा उठान और जरूरी नागरिक सुविधाओं पर खर्च किया जाएगा। दरअसल, निगम लंबे समय से बजट की कमी का हवाला देकर कई विकास कार्यों को टालता रहा है, लेकिन दूसरी तरफ अधिकारियों के काफिले पर हर महीने लाखों रुपये किराए के रूप में बहाए जा रहे थे।
बैठक में खुला खर्च का हिसाब, ‘nagar nigam vehicles’ की उपयोगिता पर उठे सवाल
मंगलवार को नगर निगम परिसर में नगर आयुक्त आलोक कुमार पांडेय की अध्यक्षता में एक उच्चस्तरीय समीक्षा बैठक हुई। इसमें निगम में चल रहे सभी अनुबंधित वाहनों और उनके ईंधन-रखरखाव पर आ रहे भारी-भरकम खर्च का हिसाब खंगाला गया। जांच में सामने आया कि कई वाहन बिना किसी अनिवार्य फील्ड ड्यूटी के सिर्फ नियमित आवाजाही के लिए चल रहे थे।
नगर आयुक्त ने सख्त लहजे में कहा कि प्रशासनिक व्यय की नियमित समीक्षा पारदर्शी व्यवस्था के लिए जरूरी है। सार्वजनिक धन की बर्बादी बर्दाश्त नहीं होगी और जिन मदों में कटौती संभव है, वहां तुरंत फैसले लिए जाएंगे। बैठक में उप नगर आयुक्त तनवीर मारवाह और मुख्य स्वास्थ्य अधिकारी डॉ. आनंद शुक्ला की मौजूदगी में वाहनों की वास्तविक उपयोगिता तय की गई।
31 में से 18 गाड़ियां बाहर, सिर्फ 13 जरूरी वाहन रहेंगे
बैठक में तय हुआ कि 31 में से केवल 13 अनिवार्य वाहन ही फील्ड व इमरजेंसी सेवाओं के लिए रखे जाएंगे, जबकि बाकी 18 वाहनों का अनुबंध तुरंत समाप्त होगा। इससे नगर निगम पर पड़ने वाला गैर-जरूरी वित्तीय बोझ फौरन कम होगा। असल में, यह पहली बार है जब निगम ने अपने ही अधिकारियों की सुविधाओं पर इतनी बड़ी कैंची चलाई है।
स्थानीय लोगों के अनुसार, शहर में सफाई और कूड़ा उठान की व्यवस्था लंबे समय से बदहाल है, जबकि अधिकारियों की गाड़ियों पर लाखों खर्च हो रहे थे। ऐसे में इस फैसले को जनता के हित में उठाया गया साहसिक कदम माना जा रहा है।
बचत का पैसा अब सफाई और कूड़ा उठान में लगेगा
इस कटौती के पीछे मुख्य मकसद शहर की जमीनी समस्याओं को हल करना है। नगर आयुक्त ने स्पष्ट किया कि गाड़ियों के मद से बचने वाले डेढ़ करोड़ रुपये को शहर के डंपिंग प्वाइंट्स को साफ करने, वार्डों में डोर-टू-डोर कूड़ा कलेक्शन को मजबूत करने और फॉगिंग व सैनिटेशन जैसे बुनियादी कार्यों में लगाया जाएगा।
इसके साथ ही निगम प्रशासन ने चेतावनी दी है कि केवल गाड़ियों तक ही यह जांच सीमित नहीं रहेगी। आने वाले दिनों में स्टेशनरी, खान-पान और अन्य प्रशासनिक मदों में हो रहे खर्चों का भी इंटरनल ऑडिट कराया जाएगा, ताकि हर एक पैसे का हिसाब जनता के सामने रहे। साफ है, नगर निगम में फिजूलखर्ची के दिन अब लदने वाले हैं।









