देहरादून में उजागर हुए बहुचर्चित नीट यूजी फर्जी सर्टिफिकेट केस की आंच अब तराई तक पहुंच गई है। NEET fake certificate scam Uttarakhand के तार उधम सिंह नगर जिले की गदरपुर तहसील तक जुड़े मिले हैं, जहां फर्जी अभिलेखों के बूते सरकारी प्रमाण पत्र तैयार कराने वाले गिरोह पर प्रशासन ने बड़ा डंडा चलाया है।
एमबीबीएस में दाखिले के लिए गढ़े गए इस फर्जीवाड़े में पांच लोगों के खिलाफ नामजद मुकदमा दर्ज कर संबंधित जाली दस्तावेज तुरंत निरस्त कर दिए गए। मास्टरमाइंड सहित तीन आरोपियों की पूर्व में हुई गिरफ्तारी के बाद सामने आई इस कार्रवाई से पूरे जिले में खलबली मची है। गदरपुर की उपजिलाधिकारी डॉ. अमृता शर्मा और तहसीलदार लीना चंद्रा धामी की अगुवाई में राजस्व विभाग की टीम ने देर रात गदरपुर में मोर्चा संभाला, और यह छानबीन अलसुबह करीब तीन बजे तक खिंची।
NEET fake certificate scam Uttarakhand: फोन में मिले सनसनीखेज सुराग
पड़ताल के घेरे में आए निखिल वर्मा और शुभम हुडिया से घंटों सघन पूछताछ हुई। दोनों के मोबाइल फोन प्रशासन ने जब्त कर पुलिस के हवाले कर दिए हैं। शुरुआती जांच में सामने आया है कि इन फोनों में गिरोह के नेटवर्क, संदिग्ध ऑडियो रिकॉर्डिंग और जाली दस्तावेजों के डिजिटल साक्ष्य मौजूद हैं। फोन की फॉरेंसिक पड़ताल से कई सफेदपोश चेहरों के बेनकाब होने की संभावना जताई जा रही है।
दरअसल, मेडिकल कॉलेजों में राज्य कोटे की 85 फीसदी सीटों पर स्थानीय छात्रों के लिए मेरिट काफी नीचे रहती है। बाहरी राज्यों या अपात्र अभ्यर्थियों को इसी कोटे का अनुचित लाभ दिलाने के लिए फर्जी डोमिसाइल, आरक्षित वर्ग और यहां तक कि अनाथ कोटे के सरकारी प्रमाण पत्र तैयार कराए जा रहे थे। डॉ. अमृता शर्मा ने स्पष्ट किया कि जांच में प्रथम दृष्टया कूटरचित अभिलेखों से सर्टिफिकेट जारी होने की पुष्टि हुई, जिनका इस्तेमाल देहरादून में मेडिकल काउंसलिंग के दौरान होना था।
स्थायी निवास और अनाथ प्रमाण पत्र निरस्त, जाति प्रमाण पत्रों की जांच जारी
स्थायी निवास और अनाथ प्रमाण पत्र मौके पर ही निरस्त कर दिए गए हैं, जबकि संदिग्ध जाति प्रमाण पत्रों की फाइलों को अग्रिम पड़ताल के लिए जिला स्क्रूटनी कमेटी के पास भेज दिया गया है। गदरपुर प्रशासन ने साफ किया है कि यदि स्क्रूटनी कमेटी और पुलिस विवेचना में तहसील या स्वास्थ्य विभाग के किसी भी कार्मिक की संलिप्तता मिलती है, तो उन्हें बख्शा नहीं जाएगा।
उधर, मामले ने गंभीर राजनीतिक रंग भी ले लिया है। कांग्रेस के प्रदेश उपाध्यक्ष राजेंद्र पाल सिंह ने कहा कि यह जांच केवल पटवारी या तहसील के छोटे कारिंदों तक सीमित नहीं रहनी चाहिए, क्योंकि बिना उच्च स्तर के संरक्षण के ऐसे संवेदनशील प्रमाण पत्र जारी नहीं हो सकते। कांग्रेस ने पूरे प्रकरण की उच्चस्तरीय निष्पक्ष जांच और दोषी अधिकारियों पर सीधे आपराधिक मुकदमे की मांग की है। बहरहाल, सालों मेहनत कर नीट में अच्छे अंक लाने वाले मेधावी छात्रों के हक पर डाका डालने वाले इस तंत्र की जड़ें खोदने की मांग तेज हो गई है।
गौरतलब है कि मेडिकल कॉलेजों में दाखिले के लिए होने वाली काउंसलिंग में दस्तावेजों का सत्यापन सबसे अहम चरण होता है। फर्जी प्रमाण पत्रों के जरिए अपात्र अभ्यर्थियों के दाखिले से न केवल योग्य छात्रों का हक मारा जाता है, बल्कि चिकित्सा शिक्षा की गुणवत्ता पर भी सवाल खड़े होते हैं। यही वजह है कि प्रशासन इस बार पूरे नेटवर्क को जड़ से खत्म करने के मूड में दिख रहा है, और फोन की फॉरेंसिक जांच से और गिरफ्तारियों की संभावना से इनकार नहीं किया जा रहा है।









