देहरादून। उत्तराखंड में त्रिवेंद्र सरकार से लेकर मौजूदा धामी सरकार तक के साढ़े नौ वर्षों के कार्यकाल पर मुख्य विपक्षी दल कांग्रेस ने तीखा हमला बोला है (Congress vs BJP Uttarakhand)। राज्य के सीमावर्ती पर्वतीय जिलों में प्रदेश मंत्रिमंडल की बैठकें कराने की प्रशासनिक तैयारियों को कांग्रेस ने आगामी 2027 विधानसभा चुनाव का विशुद्ध ‘फोटो-ऑप’ करार दिया है। प्रदेश कांग्रेस की मुख्य प्रवक्ता गरिमा मेहरा दसौनी ने दो-टूक कहा कि सीमांत क्षेत्र राष्ट्रीय सुरक्षा और अस्तित्व की रीढ़ हैं, इन्हें केवल चुनावी पर्यटन का अखाड़ा नहीं बनाया जा सकता।
दसौनी ने सवाल दागा कि जब चमोली, उत्तरकाशी और पिथौरागढ़ की गर्भवती महिलाओं तथा बुजुर्गों को सड़कविहीन इलाकों से दांडी-कंडी के सहारे मीलों पैदल चलकर अस्पताल पहुंचना पड़ रहा था, तब शासन कहां सोया हुआ था? उनके मुताबिक पहाड़ की इस पीड़ा पर सालों तक आंखें मूंदने वाली सरकार का अब अचानक बैठकों का काफिला लेकर सीमांत जिलों का रुख करना कई सवाल खड़े करता है। कांग्रेस का आरोप है कि साढ़े नौ साल तक जिन मुद्दों पर चुप्पी साधी गई, उन्हें अब चुनावी मौसम में भुनाने की तैयारी है।
भुतहा गांव और पलायन पर सवाल
दसौनी के अनुसार पहाड़ी ढलानों पर खाली होते घर महज आंकड़ों का खेल नहीं हैं। शिक्षा, स्वास्थ्य, संपर्क मार्ग और मोबाइल कनेक्टिविटी के अभाव में सीमांत गांवों का ‘घोस्ट विलेज’ में तब्दील होना सीधे तौर पर देश की सीमा सुरक्षा से खिलवाड़ है। उन्होंने कहा कि सीमा तब मजबूत होती है जब वहां के स्थानीय नागरिक डटे रहें, न कि तब जब राजधानी का अमला कुछ घंटों के लिए वहां टेंट लगाकर फैसले लेने का दिखावा करे।
कांग्रेस प्रवक्ता ने वन्यजीवों के लगातार बढ़ते हमलों का मुद्दा भी उठाया, जिनसे ग्रामीण खौफ के साये में जीने को मजबूर हैं। उनका आरोप है कि स्थानीय स्तर पर आजीविका सृजन के नाम पर केवल फाइलों का पेट भरा गया, जबकि जमीनी हकीकत नहीं बदली। पलायन आयोग की रिपोर्टों का हवाला देते हुए कांग्रेस ने कहा कि सरकार ने पहाड़ की इस पीड़ा से आंखें मूंद रखी हैं।
Congress vs BJP Uttarakhand: ‘स्वस्थ सीमा अभियान’ की मांगी रिपोर्ट
प्रशासनिक दावों की कलई खोलते हुए दसौनी ने जनवरी 2026 में भारत-तिब्बत सीमा पुलिस (ITBP) और राज्य स्वास्थ्य महकमे के बीच हुए साझा समझौते का ब्योरा सामने रखा। उन्होंने पूछा कि पिथौरागढ़, चमोली और उत्तरकाशी के 108 संवेदनशील सीमांत गांवों में प्राथमिक उपचार तंत्र बहाल करने के लिए शुरू किए गए ‘स्वस्थ सीमा अभियान’ का जमीनी सच क्या है? कागजों पर बनी इस योजना के तहत कितने ग्रामीणों को टेली-मेडिसिन या मौके पर दवाएं मयस्सर हुईं, सरकार इसकी वास्तविक स्थिति जनता के सामने लाए।
कैबिनेट से पहले जन-सुनवाई और श्वेत पत्र की मांग
गरिमा दसौनी ने सरकार के सम्मुख पांच सीधे सवाल रखते हुए मांग की कि सीमांत जिलों में गाड़ी का काफिला उतारने से पहले मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी वहां जन-सुनवाई करवाएं। इसके अलावा पिछले साढ़े नौ वर्षों में सीमांत विकास के नाम पर घोषित पैकेजों पर श्वेत पत्र जारी किया जाना चाहिए, ताकि जनता को पता चल सके कि घोषणाओं में से कितना जमीन पर उतरा।
कांग्रेस ने स्पष्ट किया कि यदि बैठक के बाद हर जिले के लिए तय समयसीमा वाली एक्शन टेकन रिपोर्ट जारी नहीं की जाती, तो जनता इस सियासी कवायद को महज वोट बैंक बटोरने का हथकंडा मानेगी। अब सबकी निगाहें इस बात पर हैं कि सरकार कांग्रेस के इन आरोपों का क्या जवाब देती है और सीमांत जिलों में प्रस्तावित कैबिनेट बैठकें किस रूप में सामने आती हैं।












