पहाड़ी राज्य उत्तराखंड से उठी एक ऐसी कहानी सामने आई है, जो सेहत के लिए किसी उम्मीद की किरण से कम नहीं। देहरादून के हेल्थ-टेक स्टार्टअप सनफॉक्स टेक्नोलॉजीज ने — जिसके पोर्टेबल ईसीजी डिवाइस ‘स्पंदन’ (Spandan ECG) ने कंपनी को यह पहचान दिलाई है — सीरीज A फंडिंग राउंड में 70 लाख अमेरिकी डॉलर (तकरीबन 67 करोड़ रुपये) का निवेश जुटा लिया है। इस दौर की अगुवाई दिग्गज निवेशक आशीष कचोलिया, लशित सांघवी, अल्केमी कैपिटल और 3one4 कैपिटल ने की है। पहाड़ों से निकलकर मेडिकल-ग्रेड तकनीक पेश करने वाले किसी स्टार्टअप के लिए यह अब तक का सबसे बड़ा वित्तीय समर्थन माना जा रहा है।
कंपनी का पोर्टेबल ईसीजी डिवाइस ‘स्पंदन’ दरअसल जेब में समा जाने वाला एक ऐसा उपकरण है, जो आपात स्थिति में अस्पताल पहुंचे बिना ही कुछ मिनटों में ईसीजी रिपोर्ट दे देता है। जुटाई गई पूंजी का उपयोग कंपनी अपने घरेलू नेटवर्क को मजबूत करने और अमेरिका व यूरोपीय बाजारों में नियामकीय मंजूरी हासिल करने के लिए करेगी।
Spandan ECG: कॉलेज के एक हादसे से उपजा नवाचार
सनफॉक्स की नींव साल 2016 में देहरादून में रखी गई थी। इंजीनियरिंग की पढ़ाई के दिनों में पांच संस्थापकों — रजत जैन, अर्पित जैन, सबित रावत, नितिन चंदोला और सौरभ बडोला — ने एक ऐसा हादसा देखा जिसने उनकी सोच ही बदल दी। एक सहपाठी की अचानक दिल का दौरा पड़ने से मौत हो गई थी। समय पर जांच न मिल पाने की इसी विवशता ने इन युवाओं को बुरी तरह झकझोर दिया था।
बस, यहीं से वह सवाल उठा जो बाद में नवाचार में बदल गया — अगर गांव या कस्बे में, अस्पताल से दूर, किसी का दिल डूबने लगे तो क्या किया जाए? जवाब बनकर सामने आया ‘स्पंदन’ — एक छोटा, पोर्टेबल और किफायती ईसीजी उपकरण, जो जेब में समा सके।
गोल्डन आवर की रक्षा: PHC से जिला अस्पताल तक हब-एंड-स्पोक मॉडल
हार्ट अटैक के मामलों में पहले 60 मिनट यानी ‘गोल्डन आवर’ मरीज के जीवित बचने के लिहाज से सबसे नाजुक माने जाते हैं। लेकिन ग्रामीण और पहाड़ी क्षेत्रों में विशेषज्ञ डॉक्टरों और भारी-भरकम ईसीजी मशीनों की कमी के कारण अक्सर यही कीमती समय बर्बाद हो जाता है। ‘स्पंदन’ इसी खाई को पाटता है।
सार्वजनिक स्वास्थ्य प्रणाली में यह उपकरण हब-एंड-स्पोक मॉडल पर काम करता है। दूरदराज के प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र (PHC) या वेलनेस सेंटर में तैनात स्वास्थ्यकर्मी मरीज का ईसीजी लेकर तुरंत जिला अस्पताल या मेडिकल कॉलेज के हृदयरोग विशेषज्ञ से साझा कर सकते हैं। इसका मतलब यह हुआ कि गांव में बैठा मरीज भी मिनटों में शहर के बड़े डॉक्टर की नजर में आ जाता है।
शार्क टैंक से अंतरराष्ट्रीय बाजार तक का सफर
यह वही कंपनी है जो शार्क टैंक इंडिया में आने के बाद राष्ट्रीय स्तर पर चर्चा में आई थी। वर्तमान में केन्या, तंजानिया, घाना और दक्षिण अफ्रीका जैसे देशों में यह नियामकीय अनुमोदन के साथ अपनी सेवाएं दे रही है। कंपनी प्रबंधन के मुताबिक, नया निवेश मुख्य रूप से डीप-टेक रिसर्च, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस एल्गोरिदम के क्लिनिकल वैलिडेशन और अमेरिकी एफडीए (US FDA) व यूरोपीय सीई सर्टिफिकेशन की प्रक्रियाओं को गति देने पर केंद्रित रहेगा।
मकसद साफ है — भारत में विकसित यह तकनीक विकसित देशों के स्वास्थ्य तंत्र में भी अपनी जगह बनाए। देहरादून के इन पांच दोस्तों की यह सफलता पहाड़ी राज्यों के युवाओं के लिए एक सीधा संदेश भी है: अगर विचार ठोस हो, तो संसाधनों की कमी बड़ी कामयाबी की राह नहीं रोक सकती।









