उत्तराखंड के हल्द्वानी में सामने आए कथित शुद्धीकरण विवाद के बाद उत्तर भारत के सियासी गलियारों में अचानक हलचल तेज हो गई है। साल 2027 में होने वाले आगामी विधानसभा चुनावों को ध्यान में रखते हुए तमाम राजनीतिक दलों ने इस मुद्दे को लेकर अपनी-अपनी रणनीतियां बनानी शुरू कर दी हैं।
मुख्य विपक्षी पार्टी कांग्रेस ने इस पूरे घटनाक्रम को दलित समुदाय के आत्मसम्मान और स्वाभिमान से जोड़ते हुए सरकार के खिलाफ मोर्चा खोल दिया है। वहीं दूसरी तरफ, मामले की संवेदनशीलता को देखते हुए सत्ताधारी भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) ने भी सख्त रुख अपनाते हुए विपक्ष पर जोरदार पलटवार किया है।
एक-एक सीट पर फंसा पेंच: 19% दलित आबादी तय करेगी हार-जीत
उत्तराखंड की कुल 70 सीटों वाली विधानसभा में सरकार बनाने के लिए जादूई आंकड़ा 36 है। ऐसे में प्रदेश की 13 अनुसूचित जाति (SC) और 2 अनुसूचित जनजाति (ST) के लिए आरक्षित सीटें बेहद अहम साबित होती हैं। राज्य में दलित मतदाताओं की आबादी करीब 17 से 19 प्रतिशत के बीच है। यह आबादी सिर्फ आरक्षित सीटों पर ही नहीं, बल्कि हरिद्वार, उधमसिंह नगर और देहरादून जिलों की सामान्य विधानसभा सीटों पर भी उम्मीदवारों की हार और जीत तय करने में बड़ी भूमिका निभाती है।
अगर पिछले चुनावी आंकड़ों पर नजर डालें, तो साल 2017 के विधानसभा चुनाव में बीजेपी ने इन 13 आरक्षित सीटों में से 11 पर शानदार जीत हासिल करके प्रचंड बहुमत प्राप्त किया था। हालांकि, 2022 के चुनावों में यह संख्या घटकर 9 रह गई। यही वजह है कि आगामी विधानसभा चुनाव को देखते हुए दोनों ही प्रमुख दल इस वर्ग को लेकर किसी भी तरह का जोखिम उठाने के मूड में नहीं हैं।
उत्तर प्रदेश और पंजाब में भी बड़ा जनाधार
दलित राजनीति की यह तपिश सिर्फ उत्तराखंड तक सीमित नहीं है, बल्कि पड़ोसी राज्यों उत्तर प्रदेश और पंजाब की राजनीति पर भी इसका सीधा असर देखने को मिल रहा है। उत्तर प्रदेश में लगभग 22 फीसदी दलित आबादी निवास करती है और वहां की 403 विधानसभा सीटों में से 86 सीटें आरक्षित हैं। भले ही 2022 के यूपी चुनाव में कांग्रेस एक भी आरक्षित सीट नहीं जीत सकी थी, लेकिन 2024 के लोकसभा चुनाव में बाराबंकी सुरक्षित सीट पर मिली जीत से पार्टी का मनोबल काफी बढ़ा हुआ है।
वहीं दूसरी ओर पंजाब की बात करें, तो वहां 34 सीटें आरक्षित हैं, लेकिन दलित समुदाय का असर राज्य की करीब 50 विधानसभा सीटों पर माना जाता है। वर्ष 2017 के पंजाब चुनाव में कांग्रेस ने 21 आरक्षित सीटों पर एकतरफा जीत दर्ज की थी, हालांकि 2022 के चुनाव में पार्टी सिमटकर केवल 3 सीटों पर ही रह गई थी।
आरोपों और प्रत्यारोपों का दौर जारी
इस विवादित घटनाक्रम के बाद दोनों राजनीतिक दलों के अग्रणी संगठनों के नेता खुलकर एक-दूसरे के आमने-सामने आ गए हैं। कांग्रेस अनुसूचित जाति विभाग का साफ तौर पर आरोप है कि यह घटना सत्ताधारी दल की संकीर्ण मानसिकता को दर्शाती है। इसके विरोध में पार्टी पूरे प्रदेश में उग्र प्रदर्शन करने की तैयारी कर रही है।
दूसरी तरफ, बीजेपी अनुसूचित मोर्चा के प्रतिनिधियों ने इस पर पलटवार करते हुए कहा है कि विरोधी दल केवल वोट बैंक और तुष्टीकरण का खेल खेल रहे हैं। बीजेपी नेताओं का तर्क है कि इस तरह के संवेदनशील और सामाजिक मामलों पर राजनीति करने के बजाय समाज में आपसी भाईचारे, शांति और सौहार्द को बढ़ावा दिया जाना चाहिए।
