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कहने को मेडिकल कॉलेज, पर इलाज के नाम पर सन्नाटा, संजय पाण्डे ने खोली पोल!

By: Sansar Live Team

On: Sunday, April 6, 2025 4:27 PM

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Almora News : उत्तराखंड के पहाड़ी इलाकों में स्वास्थ्य सेवाओं की बदहाली किसी से छिपी नहीं है। अल्मोड़ा मेडिकल कॉलेज, जो पहाड़ का सबसे बड़ा स्वास्थ्य केंद्र माना जाता है, आज अपनी कमियों के चलते सुर्खियों में है। सामाजिक कार्यकर्ता संजय पाण्डे ने इस मुद्दे को जोर-शोर से उठाया है।

उनकी आवाज़ में दर्द भी है और गुस्सा भी। संजय कहते हैं, “जिस मां को समय पर इलाज नहीं मिला, उसकी मौत मेरे लिए एक सबक बन गई। मैंने कसम खाई है कि अब किसी और मां को इस तरह तड़पने नहीं दूंगा।” यह सिर्फ एक बेटे की पीड़ा नहीं, बल्कि पूरे पहाड़ की पुकार है।

प्राचार्य से मुलाकात: सवालों का जवाब कौन देगा?

हाल ही में संजय पाण्डे ने अल्मोड़ा मेडिकल कॉलेज के प्राचार्य प्रो. सी. पी. भैसोड़ा से मुलाकात की। इस दौरान उन्होंने कॉलेज में कार्डियोलॉजिस्ट और न्यूरोसर्जन जैसे विशेषज्ञों की गैरमौजूदगी पर सवाल उठाए। संजय का कहना है, “उत्तराखंड में सबसे ज्यादा मौतें दिल के दौरे और सिर की चोट से होती हैं। फिर पहाड़ के सबसे बड़े मेडिकल कॉलेज में इनके विशेषज्ञ क्यों नहीं हैं? यह स्वास्थ्य नीति नहीं, बल्कि लोगों की जिंदगी से खिलवाड़ है।” प्राचार्य ने उनकी बातों को गंभीरता से लिया और सुधार का भरोसा दिया, लेकिन सवाल यह है कि यह भरोसा कब हकीकत बनेगा?

राजनीति की चुप्पी: जनता की कीमत कौन चुकाएगा?

संजय ने नेताओं की खामोशी पर भी तंज कसा। उनका कहना है, “जो सरकारें मेडिकल कॉलेज खोलने का ढोल पीटकर वोट मांगती हैं, क्या उन्हें अस्पतालों में तड़पते मरीज नहीं दिखते? कोई विधायक या सांसद इस मुद्दे को विधानसभा या संसद में क्यों नहीं उठाता?” उनका मानना है कि विकास सिर्फ भाषणों में नहीं, बल्कि जमीनी हकीकत में दिखना चाहिए। आज जनता को इलाज के बजाय सिस्टम का ‘व्यस्त सुर’ सुनने को मिलता है। दूर-दराज से आने वाले मरीजों को न तो सही जानकारी मिलती है और न ही समय पर इलाज। संजय ने जनसंपर्क अधिकारी की लापरवाही पर भी सवाल उठाया, “जब फोन ही नहीं उठता, तो मरीज किससे मदद मांगे?”

डिजिटल इंडिया का सपना: हकीकत से कोसों दूर

संजय ने डिजिटल इंडिया के दावों पर भी चुटकी ली। उनका कहना है, “जब एक बूढ़ी मां पर्ची बनवाने के लिए स्मार्टफोन की तलाश में भटकती है, तो यह डिजिटल क्रांति मजाक बनकर रह जाती है।” उन्होंने मांग की कि बुजुर्गों और की-पैड फोन इस्तेमाल करने वालों के लिए मैनुअल पर्ची सिस्टम को फिर से शुरू किया जाए। यह मांग न सिर्फ जायज है, बल्कि पहाड़ की जमीनी जरूरतों को भी दर्शाती है।

सरकारी आंकड़े या पहाड़ की बदनसीबी?

सरकारी आंकड़ों के मुताबिक, अल्मोड़ा में न तो कार्डियोलॉजिस्ट की पोस्ट स्वीकृत है और न ही न्यूरोसर्जन की। पिथौरागढ़ में कार्डियोलॉजिस्ट की एक पोस्ट है, जो खाली पड़ी है। नैनीताल में एक कार्डियोलॉजिस्ट काम कर रहा है, लेकिन न्यूरोसर्जन की पोस्ट रिक्त है। देहरादून को छोड़कर बाकी जिलों में हालात और भी खराब हैं। संजय कहते हैं, “यह आंकड़े नहीं, पहाड़ की बदहाली की कहानी हैं।”

एक मां की मौत से शुरू हुआ संघर्ष

संजय की यह लड़ाई निजी दर्द से शुरू हुई। अपनी मां को खोने के बाद उन्होंने ठान लिया कि अब किसी और को इलाज के अभाव में अपनों को नहीं खोना पड़ेगा। वे कहते हैं, “अल्मोड़ा मेडिकल कॉलेज में विशेषज्ञों की नियुक्ति तक मैं चुप नहीं बैठूंगा। यह अब मेरा व्यक्तिगत मिशन नहीं, बल्कि सामाजिक जिम्मेदारी है।” उनकी यह बात हर उस इंसान के दिल को छूती है, जो सिस्टम की नाकामी का शिकार हुआ है।

जनप्रतिनिधियों से आखिरी गुहार

संजय ने नेताओं से सीधी अपील की, “आप कहते हैं कि स्वास्थ्य आपकी प्राथमिकता है, तो अब इसे साबित करें। इस मुद्दे को विधानसभा और संसद में उठाएं। जिनके वोट से आप सत्ता में हैं, वे आज इलाज के बिना दम तोड़ रहे हैं। अगर अब भी चुप रहे, तो यह मौन इतिहास में अपराध माना जाएगा।” उनकी यह अपील सिर्फ नेताओं के लिए नहीं, बल्कि हर जागरूक नागरिक के लिए एक सवाल है—क्या हम चुप रहकर इस लापरवाही के भागीदार नहीं बन रहे?

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