देहरादून: उत्तराखंड में मदरसा शिक्षा व्यवस्था इस वक्त अपने सबसे बड़े संकट से गुजर रही है। राज्य सरकार ने आगामी 1 जुलाई 2026 से मदरसा बोर्ड को पूरी तरह समाप्त करने का कड़ा फैसला लिया है। इस बीच एक ऐसा खुलासा हुआ है जिसने सबको हैरान कर दिया है। रिपोर्ट के मुताबिक, उत्तराखंड मदरसा शिक्षा परिषद से मान्यता प्राप्त 54 मदरसों में से 30 मदरसे ऐसे हैं, जहां मुंशी (हाईस्कूल) और आलिम (इंटर) स्तर पर एक भी छात्र मौजूद नहीं है। बाकी बचे 24 मदरसों की हालत भी इतनी पतली है कि वे बोर्ड की मान्यता के बुनियादी मानकों को भी पूरा नहीं कर पा रहे हैं।
छात्रों के टोटे से खाली हुए मदरसे
लंढौरा स्थित मदरसा आईशा सिद्दीका के प्रबंधक अब्दुस्लाम बताते हैं कि 1 जुलाई से मदरसा बोर्ड खत्म होने के डर से इस साल मुंशी और आलिम स्तर पर दाखिले लगभग शून्य रहे हैं। आंकड़े वाकई डराने वाले हैं; शैक्षिक सत्र 2025-26 में लिस्टेड 54 मदरसों में से केवल 24 में ही कुछ छात्र पंजीकृत हैं, जबकि 30 मदरसे पूरी तरह ‘छात्रविहीन’ हो चुके हैं। उच्च कक्षाओं में मदरसा शिक्षा की मांग अब लगभग खत्म होने की कगार पर पहुंच गई है।
मान्यता के मानकों पर फेल हुए संस्थान
उत्तराखंड अल्पसंख्यक शिक्षा प्राधिकरण के अध्यक्ष डॉ. सुरजीत सिंह गांधी के अनुसार, राज्य में कुल 452 मदरसे हैं, जिनमें से 54 को नौवीं से बारहवीं तक की मान्यता मिली हुई थी। नियम कहते हैं कि मुंशी और मौलवी स्तर के लिए कम से कम 30 छात्र होने चाहिए, लेकिन वर्तमान स्थिति में केवल 9 मदरसे ही ऐसे बचे हैं जो इन मानकों पर खरे उतर रहे हैं। इस सत्र में आलिम स्तर पर पूरे प्रदेश में केवल 83 नियमित छात्र ही पढ़ाई कर रहे हैं। ऐसे में इन संस्थानों की मान्यता पर तलवार लटक रही है, जिससे छात्रों के भविष्य पर बड़ा संकट मंडरा रहा है।
मदरसा बोर्ड भंग, अब बनेगा नया सिस्टम
राज्य सरकार का तर्क है कि मदरसा छात्रों को “मुख्यधारा” की शिक्षा से जोड़ना अनिवार्य है। इसी मकसद से 1 जुलाई 2026 से ‘उत्तराखंड मदरसा शिक्षा परिषद’ को भंग कर दिया जाएगा। इसकी जगह अब ‘उत्तराखंड राज्य अल्पसंख्यक शिक्षा प्राधिकरण’ का गठन किया जा रहा है। अब सभी अल्पसंख्यक शैक्षणिक संस्थानों की मान्यता, सिलेबस और निगरानी सीधे उत्तराखंड शिक्षा बोर्ड के फ्रेमवर्क के तहत होगी। सरकार का मानना है कि इससे मदरसा छात्रों के सर्टिफिकेट सरकारी नौकरियों और उच्च शिक्षा के लिए पूरी तरह मान्य हो सकेंगे।
धार्मिक शिक्षा और संबद्धता की चुनौती
हालांकि, चुनौती अभी खत्म नहीं हुई है। अभी तक एक भी मदरसा ‘उत्तराखंड विद्यालयी शिक्षा परिषद’ (UBSE) से संबद्धता (Affiliation) हासिल नहीं कर पाया है। जबकि 1 अप्रैल से नया शिक्षा सत्र 2026-27 शुरू होने जा रहा है। डॉ. गांधी का कहना है कि वे मदरसा प्रबंधकों के साथ बैठकें कर रहे हैं ताकि संबद्धता की प्रक्रिया जल्द शुरू की जा सके। धार्मिक शिक्षा के लिए भी एक विशेष कमेटी बनाई गई है जो यह तय करेगी कि मदरसों में मजहबी तालीम को आधुनिक शैक्षणिक मापदंडों के साथ कैसे तालमेल बिठाकर दिया जाए।
अब सवाल यह है कि क्या छात्रविहीन ये 30 मदरसे नए नियमों के तहत खुद को बचा पाएंगे या धीरे-धीरे बंद होकर इतिहास का हिस्सा बन जाएंगे? सरकार की इस पहल से शिक्षा के स्तर में सुधार की उम्मीद तो है, लेकिन जमीनी हकीकत फिलहाल काफी चुनौतीपूर्ण नजर आ रही है।
