देहरादून। उत्तराखण्ड की पुष्कर सिंह धामी सरकार ने सूबे की शिक्षा व्यवस्था में एक बहुत बड़ा और ऐतिहासिक बदलाव कर दिया है। मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने सूबे में दशकों पुराने मदरसा बोर्ड को समाप्त कर ‘उत्तराखण्ड राज्य अल्पसंख्यक शिक्षा प्राधिकरण’ की शुरुआत की है। सरकार का दावा है कि “वन नेशन-वन एजुकेशन” यानी एक देश-एक शिक्षा की सोच को जमीन पर उतारने के लिए यह देश में अपने आप में पहला और ऐतिहासिक कदम है। मुख्यमंत्री आवास में आयोजित एक भव्य कार्यक्रम के दौरान सीएम धामी ने इस नए प्राधिकरण का विधिवत शुभारंभ किया और विभिन्न अल्पसंख्यक शिक्षण संस्थानों को नए मान्यता प्रमाण पत्र भी सौंपे।
दरअसल, इस बड़े फैसले के पीछे धामी सरकार की मंशा अल्पसंख्यक समुदाय के बच्चों को मुख्यधारा की आधुनिक शिक्षा से जोड़ना है। कार्यक्रम के दौरान मुख्यमंत्री खुद बच्चों के बीच पहुंचे और उन्हें एनसीईआरटी (NCERT) की किताबें भेंट कीं। इस दौरान उन्होंने साफ किया कि अब अल्पसंख्यक समाज के बच्चों का भविष्य सिर्फ धार्मिक शिक्षा तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि उनके हाथों में आधुनिक कॉपी-किताबें और नए जमाने का हुनर (कौशल विकास) भी होगा।
आस्था और आधुनिकता का अनूठा संतुलन
सीएम पुष्कर सिंह धामी ने साफ शब्दों में कहा कि यह कदम किसी भी समुदाय की पहचान, संस्कृति या उनकी धार्मिक परंपराओं को ठेस पहुंचाने के लिए नहीं उठाया गया है। असल में, सरकार चाहती है कि सूबे का हर बच्चा अपनी सांस्कृतिक और धार्मिक जड़ों से जुड़े रहने के साथ-साथ विज्ञान, गणित, कंप्यूटर और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) जैसी आधुनिक तकनीकों में भी माहिर बने। मुख्यमंत्री ने कहा कि देवभूमि हमेशा से ज्ञान और संस्कारों की धरती रही है, इसलिए हमारी जिम्मेदारी है कि यहां की शिक्षा व्यवस्था पूरे देश के लिए एक रोल मॉडल बनकर उभरे।
राजनीति नहीं, बच्चों के भविष्य पर फोकस: सीएम धामी
मदरसा बोर्ड को खत्म करने और उत्तराखण्ड राज्य अल्पसंख्यक शिक्षा प्राधिकरण के गठन को लेकर होने वाली राजनीति पर भी मुख्यमंत्री ने कड़ा रुख अपनाया। उन्होंने स्पष्ट किया कि सरकार का फोकस राजनीति पर नहीं, बल्कि बच्चों के सुनहरे भविष्य पर है। पहले की व्यवस्थाओं में कुछ ही वर्गों को तरजीह मिल पाती थी, लेकिन अब राज्य के सभी छह अधिसूचित अल्पसंख्यक समुदायों के बच्चों को समान अवसर मिलेंगे। इस नए मॉडल से अल्पसंख्यक शिक्षा व्यवस्था में पारदर्शिता आएगी और धांधलियों पर लगाम लगेगी। यह प्राधिकरण केवल मान्यता बांटने वाली संस्था नहीं होगी, बल्कि शिक्षकों की ट्रेनिंग और नेशनल एजुकेशन पॉलिसी (NEP-2020) को सही मायने में लागू करने का जरिया बनेगी।
राष्ट्रीय शिक्षा नीति-2020 को जमीन पर उतारने की कवायद
बताया जा रहा है कि यह पूरा मॉडल प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की राष्ट्रीय शिक्षा नीति-2020 के सिद्धांतों पर आधारित है। सरकार अब केवल डिग्रियां बांटने के बजाय युवाओं को रोजगार, स्टार्टअप और डिजिटल स्किलिंग से जोड़ना चाहती है। कार्यक्रम में मौजूद कैबिनेट मंत्री गणेश जोशी और तमाम शिक्षाविदों के बीच सीएम धामी ने समाज के सभी प्रबुद्ध नागरिकों और धर्मगुरुओं से अपील की कि वे इस नई और प्रगतिशील व्यवस्था को सफल बनाने में सरकार का कंधा मजबूत करें। आने वाले सालों में यह बदलाव सूबे के हजारों बच्चों की जिंदगी को एक नई और सकारात्मक दिशा देने वाला साबित होगा।
