ओस्लो में शुक्रवार को एक ऐतिहासिक घोषणा हुई। नॉर्वेजियन नोबेल कमेटी ने 2026 का शांति नोबेल पुरस्कार (Nobel Peace Prize 2026) दक्षिण अफ्रीका की प्रख्यात न्यायविद् नवी पिल्लै को देने का ऐलान किया। 85 वर्षीय पिल्लै को यह सम्मान अंतरराष्ट्रीय कानून, मानवाधिकारों और शांति के लिए उनके जीवनभर के असाधारण योगदान के लिए दिया गया है। खबर मिलते ही दुनिया भर के मानवाधिकार कार्यकर्ताओं और कानूनी विशेषज्ञों ने इस फैसले का स्वागत किया।
कमेटी के अध्यक्ष यॉर्गन वाटने फ्रिडनेस ने पिल्लै को “हमारे समय की सबसे साहसी कानूनी विशेषज्ञों में से एक” बताया। उन्होंने कहा कि नेल्सन मंडेला और रॉबेन आइलैंड के कैदियों के साथ खड़े होने से लेकर हमारे समय के बड़े अंतरराष्ट्रीय मुकदमों तक, उनके काम में एक निरंतर धागा है। इस बार शांति पुरस्कार के लिए 287 नामांकन आए थे, जिनमें पोप लियो और कनाडा के प्रधानमंत्री मार्क कार्नी जैसे नाम भी शामिल थे। पुरस्कार के साथ 1.2 करोड़ स्वीडिश क्रोनर (लगभग 1.2 मिलियन डॉलर) की राशि भी मिलेगी। गौरतलब है कि 2026 का पुरस्कार शांति नोबेल की 125वीं वर्षगांठ पर दिया जा रहा है, जो पहली बार 1901 में प्रदान किया गया था।
Nobel Peace Prize 2026: कौन हैं नवी पिल्लै?
दरअसल, नवी पिल्लै की कहानी संघर्ष और साहस की मिसाल है। 1941 में डरबन में भारतीय-तमिल मूल के परिवार में जन्मीं पिल्लै रंगभेद के दौर में पली-बढ़ीं। तमाम नस्लीय और लैंगिक बाधाओं को पार करते हुए वह 1967 में नटाल प्रांत में अपनी कानूनी प्रैक्टिस खोलने वाली पहली अश्वेत महिला बनीं। उस दौर में उन्होंने रंगभेद विरोधी कार्यकर्ताओं और राजनीतिक कैदियों का बचाव किया और राज्य सुरक्षा बलों द्वारा कार्यकर्ताओं की गैरकानूनी हिरासत और यातना को उजागर किया।
1973 में उन्होंने सरकार के खिलाफ एक ऐतिहासिक मुकदमा जीता, जिससे दक्षिण अफ्रीका के कुख्यात रॉबेन आइलैंड के राजनीतिक कैदियों — जिनमें नेल्सन मंडेला भी थे — को कानूनी प्रतिनिधित्व का अधिकार मिला। रंगभेद खत्म होने के एक साल बाद, 1994 में वह दक्षिण अफ्रीका की हाई कोर्ट की जज बनीं।
रवांडा से लेकर गाजा तक का सफर
असल में पिल्लै का अंतरराष्ट्रीय करियर 1995 में शुरू हुआ, जब वह रवांडा के लिए बने अंतरराष्ट्रीय आपराधिक न्यायाधिकरण (ICTR) की जज चुनी गईं। बतौर अध्यक्ष उन्होंने जीन-पॉल अकायेसू मामले की सुनवाई की, जिसमें पहली बार यह स्थापित हुआ कि बलात्कार और यौन हिंसा नरसंहार के कृत्य हो सकते हैं — अंतरराष्ट्रीय कानून में यह एक मील का पत्थर था। इसके बाद वह अंतरराष्ट्रीय आपराधिक न्यायालय (ICC) की जज रहीं और 2008 से 2014 तक संयुक्त राष्ट्र की मानवाधिकार उच्चायुक्त के पद पर रहीं।
हाल के वर्षों में उन्होंने कब्जे वाले फिलिस्तीनी क्षेत्रों पर संयुक्त राष्ट्र के स्वतंत्र अंतरराष्ट्रीय जांच आयोग की अध्यक्षता की। इस आयोग ने 2025 में निष्कर्ष निकाला था कि इजरायल ने गाजा में नरसंहार किया है। यही वजह है कि इस बार के पुरस्कार को कई लोग मौजूदा वैश्विक संघर्षों के संदर्भ में भी देख रहे हैं।
ट्रंप को लेकर मजाक और पुरस्कार का बड़ा संदेश
दिलचस्प बात यह है कि जब पुरस्कार की घोषणा हुई, तब 85 वर्षीय पिल्लै जर्मनी के न्यूरेमबर्ग में एक सम्मेलन में मौजूद थीं। शुभचिंतकों की छोटी-सी भीड़ के सामने उन्होंने मजाकिया अंदाज में कहा, “अगर आप थोड़ी और तालियां बजाएं, तो शायद मैं यह पुरस्कार ट्रंप के साथ बांट लूं।” वकील और जज होने के नाते उन्होंने हंसते हुए कहा कि वह पहले इस जानकारी की पुष्टि करना चाहेंगी। गौरतलब है कि अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप खुद इस पुरस्कार के प्रबल दावेदारों में गिने जा रहे थे।
नोबेल कमेटी ने अपने बयान में कहा, “ऐसे समय में जब युद्धों और संघर्षों की संख्या बढ़ रही है, और जब अंतरराष्ट्रीय कानून के जजों और संस्थानों पर राजनीतिक हमले हो रहे हैं, कमेटी यह याद दिलाना चाहती है कि बिना बल या हिंसा के संघर्ष सुलझाने की क्षमता अंतरराष्ट्रीय कानून के शासन पर निर्भर है।” बहरहाल, शांति पुरस्कार का औपचारिक समारोह 10 दिसंबर को ओस्लो में होगा, जहां पिल्लै को यह प्रतिष्ठित सम्मान सौंपा जाएगा।















